छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 270 of 978
Read in contextPage 270
| २६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| उदयास्तमने स्तः। तन्निवासिनां च प्राणिनामभावे तान्प्रति तेनैव मार्गेण गच्छन्नपि नैवोदेता नास्तमेतेति चक्षुर्गोचरापत्तेस्तदत्ययस्य चाभावात्। | उदय और अस्त हैं ही नहीं। उन पुरियोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंका अभाव हो जानेपर उनके लिये सूर्यदेव उसी मार्गसे जाते हुए भी न तो उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, क्योंकि उस समय सूर्यका किसीकी दृष्टिका विषय होना अथवा न होना समाप्त हो जाता है। |
| तथामरावत्याः सकाशाद् द्विगुणं कालं संयमनी पुरी वस्यतस्तन्निवासिनः प्राणिनः प्रति दक्षिणत इवोदेत्युत्तरतोऽस्तमेतीत्युच्यतेऽस्मद्बुद्धिंचापेक्ष्य; तथोत्तरास्वपि पुरीषु योजना। सर्वेषां च मेरुत्तरतो भवति। | तथा अमरावती पुरीकी अपेक्षा दूने समय संयमनी पुरी रहती है। अतः उसमें रहनेवाले प्राणियोंके लिये सूर्य मानो दक्षिणकी ओरसे उदित होता है और उत्तरमें अस्त हो जाता है—यह बात हमलोगोंकी दृष्टिको लेकर कही गयी है। इसी प्रकार आगेकी अन्य पुरियोंमें भी योजना कर लेनी चाहिये। तथा मेरु इन सभीके उत्तरकी ओर है। |
| यदामरावत्यां मध्याह्नगतः सविता तदा संयमन्यामुद्यन् दृश्यते, तत्र मध्याह्नगतो वारुण्यामुद्यन्दृश्यते, तथोत्तरस्याम्; प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्यत्वात्। इलावृतवासिनां सर्वतः पर्वतप्राकारनि- | जिस समय अमरावती पुरीमें सूर्य मध्याह्नमें स्थित होता है उस समय संयमनी पुरीमें वह उदित होता देखा जाता है, और वहाँपर मध्याह्नमें स्थित होनेपर वरुणकी पुरीमें उदित होता दिखायी देता है। इसी प्रकार उत्तरदिशावर्तिनी पुरीके विषयमें समझना चाहिये; क्योंकि उसकी प्रदक्षिणाका चक्र सर्वत्र समान है। सूर्यरश्मियोंके |