छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 225 of 978
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खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१
| मूल शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मनुपमृद्य न जायते भेदाभेदप्रत्ययोविरोधात् । न हि तैमिरिकद्विचन्द्रादिभेदप्रत्ययमनुपमृद्य तिमिरापगमे चन्द्राद्येकत्वप्रत्यय उपजायते, विद्याविद्याप्रत्यययोविरोधात् ।<br><br>तत्रैवं सति यं भेदप्रत्ययमुपादाय कर्मविधयः<br><br>(परिव्राज एव ब्रह्मसंस्थत्वम्)<br><br>प्रवृत्ताः स यस्योपमर्द्दितः “सद्... एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “तत्सत्यम्” (छा० उ० ६।८।७) “विकारभेदोऽनृतम्” इत्येतद्वाक्यप्रमाणजनितेनैकत्वप्रत्ययेन स सर्वकर्मभ्यो निवृत्तो निमित्तनिवृत्तेः। स च निवृत्तकर्मा ब्रह्मसंस्थ उच्यते स च परिव्राडेवान्यस्यासंभवात् ।<br><br>अन्यो ह्यनिवृत्तभेदप्रत्ययः सोऽन्यत्पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्निदं कृत्वेदं प्राप्नुयामिति हि मन्यते । तस्यैवं कुर्वतो न | उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि भेद और अभेद प्रत्ययोंमें परस्पर विरोध है। तिमिररोगके नष्ट होनेपर तिमिररोगजनित द्विचन्द्रदर्शनादि भेदप्रत्ययका नाश हुए बिना चन्द्रादिके एकत्वकी प्रतीति भी नहीं होती, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानकी प्रतीतियोंमें परस्पर विरोध है।<br><br>ऐसी अवस्थामें, जिस भेदप्रतीतिको स्वीकार कर कर्मविधियाँ प्रवृत्त हुई हैं, वह भेदप्रतीति जिसकी “एक ही अद्वितीय सत् है” “वही सत्य है” “विकाररूप भेद मिथ्या है” इत्यादि वाक्यप्रमाणजनित एकत्वप्रतीतिके द्वारा नष्ट हो गयी है, वही कर्मविधिके निमित्तकी निवृत्ति हो जानेसे सम्पूर्ण कर्मोंसे निवृत्त हो जाता है, वह कर्मोंसे निवृत्त हुआ पुरुष ही ब्रह्मसंस्थ कहा जाता है और वह परिव्राजक ही हो सकता है, क्योंकि दूसरेके लिये ऐसा होना असम्भव है।<br><br>उससे भिन्न जिसकी भेदप्रतीति निवृत्त नहीं हुई है, वह अन्य पदार्थोंको देखता, सुनता, मानता और जानता हुआ 'ऐसा करके इसे प्राप्त करूँगा' यह मानता है। ऐसा करनेवाले उस पुरुषको ब्रह्मनिष्ठता |