छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 224 of 978
Read in contextPage 224
| २२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| णामविशिष्टम्। न च वचनमस्ति परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थस्य मोक्षो नान्येषामिति। ज्ञानान्मोक्ष इति च सर्वोपनिषदां सिद्धान्तः। तस्माद्य एव ब्रह्मसंस्थः स्वाश्रमविहितकर्मवतां सोऽमृतत्वमेतीति। | आश्रमधर्मोंके लिये एक-सा है। ऐसा कोई शास्त्रवाक्य भी नहीं है कि एकमात्र ब्रह्मनिष्ठ संन्यासीको ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, औरोंको नहीं। ज्ञानसे मोक्ष होता है—यही सम्पूर्ण उपनिषदोंका सिद्धान्त है। अतः अपने-अपने आश्रमधर्मका पालन करनेवालोंमें जो कोई भी ब्रह्मनिष्ठ होगा वही अमृतत्वको प्राप्त होगा। |
| न; कर्मनिमित्तविद्याप्रत्यययोर्विरोधात्। [पूर्वोपन्यस्त-मतनिराकरणम्] कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदप्रत्ययवत्त्वं हि निमित्तमुपादायेदं कुर्विदं मा कार्षीरिति कर्मविधयः प्रवृत्ताः। तच्च निमित्तं न शास्त्रकृतम्, सर्वप्राणिषु दर्शनात्। "सद्... एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) "ब्रह्मैवेदं सर्वम्" (नृसिंहो० उ० ७) इति शास्त्रजन्यप्रत्ययो विद्यारूपः स्वाभाविकं क्रियाकारकफलभेदप्रत्ययं कर्मविधिनिमित्त- | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि कर्मके निमित्तभूत प्रत्यय और ज्ञानोत्पादक प्रत्ययोंमें परस्पर विरोध है। कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदसे युक्त होनारूप निमित्तको लेकर ही 'यह करो' और 'यह मत करो' इस प्रकारकी कर्मविधियाँ प्रवृत्त होती हैं। और वह निमित्त शास्त्रका किया हुआ नहीं है, क्योंकि वह सभी प्राणियोंमें देखा जाता है। "एक ही अद्वितीय सत् है" "यह सब आत्मा ही है" "यह सब ब्रह्म ही है" यह जो शास्त्रजनित विद्यारूप प्रत्यय है, वह कर्मनिमित्तक स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलभेदरूप प्रत्ययको नष्ट किये बिना |