छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 223 of 978
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खण्ड २३] शाङ्करभाष्यार्थ २१९
| शाङ्करभाष्य | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| न च यववराहादिशब्दवद्ब्रह्मसंस्थशब्दः परिव्राजके रूढः, ब्रह्मणि संस्थिति निमित्तमुपादाय प्रवृत्तत्वात् । न हि रूढिशब्दा निमित्तमुपाददते । सर्वेषां च ब्रह्मणि स्थितिरुपपद्यते । यत्र यत्र निमित्तमस्ति ब्रह्मणि संस्थितिस्तस्य तस्य निमित्तवतो वाचकं सन्तं ब्रह्मसंस्थशब्दं परिव्राडेकविषये संकोचे कारणाभावान्निरोद्धुमयुक्तम् । न च पारिव्राज्याश्रमधर्ममात्रेणामृतत्वम्, ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गात् । | इसके सिवा 'यव' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें ही रूढ भी नहीं है, क्योंकि यह तो ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्तको लेकर ही प्रवृत्त हुआ है। रूढ शब्द किसी निमित्तको स्वीकार नहीं करते। और ब्रह्ममें सभीकी स्थिति होनी सम्भव है। अतः जहाँ-जहाँ भी ब्रह्ममें स्थितिरूप निमित्त है उसी-उसी निमित्तवान्का वाचक होनेसे ब्रह्मसंस्थ शब्द केवल परिव्राट्का ही वाचक है—ऐसे संकोचका कोई कारण न होनेसे उसे उसी अर्थमें निरुद्ध करना उचित नहीं है। इसके सिवा पारिव्राज्य (संन्यास) आश्रमधर्ममात्रसे भी अमृतत्वका प्राप्त होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इससे ज्ञानकी निरर्थकताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। |
| पारिव्राज्यधर्मयुक्तमेव ज्ञानममृतत्वसाधनमिति चेन्न; आश्रमधर्मत्वाविशेषात् । धर्मो वा ज्ञानविशिष्टोऽमृतत्वसाधनमित्येतदपि सर्वाश्रमधर्मा- | यदि कहो कि पारिव्राज्यधर्मसहित ही ज्ञान अमृतत्वका साधन है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आश्रमधर्मतत्त्वमें अन्य आश्रमोंके धर्मोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है। अथवा यदि यों कहो कि ज्ञानविशिष्ट धर्म ही अमृतत्वका साधन है तो यह नियम भी समस्त |