बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संहिता—संहिता का परिचय देते हुये आचार्य वराहमिहिर ने लिखा है कि 'अनेक
प्रकार के विषयों से परिपूर्ण ज्योतिष तीन स्कन्धों में प्रतिष्ठत है, जिसमें ( सिद्धान्त
और होरा के विषयों को छोड़कर शेष ) समग्र विषयों का विवेचन किया गया हो, उसे
'संहिता' कहते हैं।' वस्तुतः संहिता स्कन्ध के विषय असीमित हैं। इन्हें विस्तारपूर्वक
बताते हुये 'संहितापदार्थाः' नाम से आचार्य ने उन विषयों का निर्देश किया है, जिनका
विवेचन संहिता में किया गया है।
संहिता का क्षेत्र भूगर्भ से अन्तरिक्ष तक है। इनके अन्दर होने वाले परिवर्तनों एवं
उनके परिणामों का निरूपण संहिता स्कन्ध करता है। संहिता के एक-एक अध्याय
आज के विज्ञान के एक-एक विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
होरा—जनसामान्य से सम्बन्धित होने के कारण यह लोकप्रिय स्कन्ध है। प्राणी
के आधानकाल से प्रसवकाल तक तथा प्रसव से अवसानकाल तक जीवन के सभी
शुभाशुभ पक्षों का विवेचन इस स्कन्ध के अन्दर किया गया है। आधानकालिक अथवा
जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति के आधार पर उनके परिणामों का विवेचन किया गया है।
इस प्रकार त्रिस्कन्ध ज्योतिष ब्रह्माण्डीय तथा मानवसम्बन्धी अनेक समस्याओं का
विश्लेषण करता है। कुछ आचार्यों ने मुहूर्त्त और शकुन को पृथक् स्कन्ध कहकर पञ्च
स्कन्धात्मक ज्योतिष शास्त्र बतलाया है; किन्तु यह समीचीन नहीं है; क्योंकि विभिन्न
शकुन और पशु-पक्षियों की चेष्टाओं का निरूपण, अङ्गविद्या तथा वास्तु आदि का
निरूपण संहिताओं में उपलब्ध है; अतः इनकी पृथक् सत्ता को स्वीकार करना संहिता
को खण्डित करना होगा।
इन तीनों स्कन्धों के प्रतिपाद्य विषय आज के विज्ञान की अनेक आवश्यकताओं
की पूर्ति पुराकाल से करते आ रहे हैं। आज विज्ञान के विकास ने इन भारतीय विद्याओं
की महत्ता को परिपुष्ट किया है।
विगत कुछ वर्षों से जनमानस वास्तुशास्त्र की ओर उन्मुख हुआ है; जबकि संहिताओं
में वास्तुशास्त्र का विशद विवेचन किया गया है। शास्त्रों की रचना मानवमात्र के कल्याण
की दृष्टि से होती है। आवश्यकता है, उनके अवलोकन एवं मनन की। संहिताओं के
अन्तर्गत अनेक विषय ऐसे हैं, जिनकी आवश्यकता जनसामान्य को होती है। उदाहरण
के रूप में मौसम विज्ञान को ही लिया जा सकता है। आज करोड़ों रुपये व्यय करने
के बाद भी मौसम विज्ञान २४-३६ घण्टे पूर्व ही वृष्टि, आँधी और तूफान की पूर्व-
सूचना दे पाता है; जबकि भारतीय ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की गति-स्थिति के आधार पर
लगभग वर्ष भर की मौसमसम्बन्धी भविष्यवाणी कर देता है। त्रुटियाँ दोनों ही पक्षों में
होती हैं। दोनों ही विधाओं में भविष्यवाणियाँ शत-प्रतिशत सत्य नहीं होती हैं। इस
त्रुटि का कारण संहिता शास्त्र बतलाता है—सद्यः होने वाले परिवर्तनों को। इन परिवर्तनों
को 'सद्यो वृष्टिलक्षण' के नाम से प्रतिपादित किया है। आधुनिक विज्ञान भी इन तात्कालिक
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