बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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समक्ष ज्योतिष शास्त्र ही आता है। यद्यपि आज 'विज्ञान' शब्द कुछ विशिष्ट विषयों का
ही परिचायक-मात्र रह गया है। भारतीय विद्याओं में विशिष्ट ज्ञान-प्रतिपादक शास्त्र को
'विज्ञान' कहा गया है। दोनों में से हम किसी भी अर्थ को ग्रहण करें तो ज्योतिष शास्त्र ही
कनिष्ठिकाधिष्ठित होगा। आज का 'विज्ञान' शब्द इंगलिश के 'साइन्स' ( Science )
शब्द का रूपान्तर है। आधुनिक विज्ञान के अन्तर्गत—गणित, भूगोल, खगोल, भूगर्भ,
ऋतु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि विषय परिगणित हैं। इन विज्ञानों
के विकास का इतिहास सत्रहवीं शताब्दी के बाद का ही है; किन्तु आज से सहस्राब्दी
पूर्व भारतीय विद्याओं में गणित, भूगोल, खगोल, कृषि आदि विषयों का विवेचन
देखने को मिलता है। यह भी सत्य है कि आज आधुनिक विज्ञान की सभी शाखायें
अनुसन्धान एवं विविध प्रयोगों द्वारा अहर्निश विकासोन्मुख हैं तथा भारतीय ज्ञान-
विज्ञान का विकास समुचित अनुसन्धान एवं प्रयोगों के अभाव के कारण शताब्दियों से
अवरुद्ध है। सिद्धान्त के क्षेत्र में तो कुछ कार्य हुये भी; किन्तु संहिता के क्षेत्र में कोई
उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। ग्यारहवीं शताब्दी के बाद भी ज्योतिष के खगोल-
विज्ञान में प्रगति हुई है; किन्तु वह भी विगत शताब्दी से अवरुद्धप्राय है। खगोल के
साथ-साथ अन्य विज्ञान की शाखाओं का भी अवलोकन करना चाहें तो हमें एकमात्र
अन्तिम प्रतिनिधि ग्रन्थ के रूप में आचार्य वराहमिहिर-विरचित 'बृहत्संहिता' ही उपलब्ध
होती है। आचार्य वराहमिहिर ने १०७ प्रकरणों में अतिसंक्षेप में लगभग ९८ विषयों
का प्रतिपादन किया है, जो अपने-आपमें अद्वितीय संकलन है, जो कि त्रिस्कन्ध ज्योतिष
के मर्मज्ञ आचार्य वराहमिहिर-जैसे दैवज्ञ से ही सम्भव था। उसके बाद इस स्तर की
कोई अन्य रचना प्रकाश में नहीं आई। यद्यपि आचार्य वल्लालसेन ने भी इसी प्रकार
के संकलन का एक सराहनीय प्रयास अपने ग्रन्थ 'अद्भुतसागर' में किया है; परन्तु
बृहत्संहिता की महत्ता आज भी अद्वितीय है। संहिता स्कन्ध के प्रतिनिध ग्रन्थ के रूप
में बृहत्संहिता की ही प्रतिष्ठा है। इस ग्रन्थ के महत्त्व-प्रतिपादन के पूर्व ज्योतिष शास्त्र
का संक्षिप्त परिचय उन जिज्ञासु पाठकों के लिये देना उचित समझता हूँ, जो कि
भारतीय ज्योतिष शास्त्र को यथार्थ रूप में जानना चाहते हैं।
भारतीय ज्योतिष ( जिसे आज 'वैदिक ज्योतिष' के नाम से जाना जाता है )
मुख्यतः तीन भागों में विभक्त है—सिद्धान्त, संहिता एवं होरा।
सिद्धान्त ज्योतिष—काल की सूक्ष्मतम इकाई त्रुटि से लेकर महत्तम इकाई
( प्रलयकाल ) तक कालगणना, विभिन्न प्रकार ( सौर-चान्द्र-सावन आदि ) के कालों
के भेद, ग्रहों की गतियों का निरूपण, पृथ्वी एवं ग्रहों की अन्तरिक्ष में स्थिति का
विवेचन, अङ्कगणित, बीजगणित, दिक्-देश-काल का विवेचन तथा इनके साधनोपयोगी
यन्त्रों का वर्णन, ग्रहगणित से सम्बन्धित उदय-अस्त-युति-ग्रहण आदि का विवेचन
सिद्धान्त ज्योतिष के अन्तर्गत आता है।
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