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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 728 में से

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पृष्ठ 7

प्राक्कथन
बृहत्संहिता : एक दृष्टि
वेदस्य निर्मलं चक्षुः ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम्।
यह सूक्ति ज्योतिष शास्त्र के वेदाङ्गत्व एवं उसके निर्दुष्ट स्वरूप को परिभाषित
करती है। ज्योतिष वेदपुरुष का निर्मल चक्षु है। यहाँ केवल चक्षु ही नहीं; अपितु 'निर्मल
चक्षु' कहा गया है। साधारण चक्षु की दृष्टि भी सामान्य होती है तथा मलिन चक्षु की
दृष्टि अस्पष्ट एवं धूमिल होती है। निर्मल (दोषरहित) चक्षु ही किसी भी वस्तु को
यथार्थ रूप में देख सकता है तथा उसका यथार्थ प्रतिपादन कर सकता है। इसीलिये
इसे वेदपुरुष का निर्मल चक्षु कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र भी देखने का ही कार्य करता
है। 'गणित' और 'वेध' नामक इसकी दो आँखें हैं। गणितागत परिणाम भी दृश्य होते
हैं एवं वेधोपलब्ध परिणाम भी दृश्य होते हैं। जब दोनों दृष्टियों से प्राप्त परिणामों में
साम्यता हो जाती है तो ज्योतिष शास्त्र का आकल्मषत्व तथा नेत्रों का निर्मलत्व—दोनों
ही प्रमाणित हो जाता है। सर्वविदित है कि ज्योतिष वेध द्वारा गणितागत परिणामों का
परीक्षण कर उसे पुष्ट करता है; इसीलिये कमलाकर भट्ट ने निःसङ्कोच यह उद्घोष कर
दिया कि 'इस शास्त्र में दृष्ट विरुद्ध मुनि द्वारा कहा गया सिद्धान्त मान्य नहीं है।' १
ज्योतिष अपनी प्रामाणिकता के लिये स्वयं को ही उत्तरदायी मानता है।
वेदाङ्ग ज्योतिष में आचार्य लगध ने इसे 'कालविधान' शास्त्र कहा है। २ काल की
अवधारणा एवं उनके भेदों का प्रतिपादन ज्योतिष शास्त्र ने ही किया है। काल के प्रमुख
नियामक सूर्य और चन्द्रमा हैं, जो ज्योतिष शास्त्र के साक्षी माने जाते हैं। ३
इनकी गतियों के परिणामस्वरूप या इनसे उत्पन्न काल ही हमारे उपयोग में आते
हैं। यद्यपि इनके अतिरिक्त पृथ्वी, बृहस्पति और नक्षत्रों के आधार पर भी कालगणना
की जाती है, जो कि हमारे दैनिक व्यवहार में हैं। इन सभी कालमानकों, इनसे उत्पन्न
कालमानों तथा उनके भेदोपभेदों को परिभाषित करने का एकमात्र श्रेय ज्योतिष शास्त्र
को ही जाता है। वेदाङ्ग होने के कारण इसकी प्राथमिकता एवं प्राचीनता स्वयमेव सिद्ध
है। यह वेदविज्ञान है; अतः जब हम विज्ञान की चर्चा करते हैं तो सर्वप्रथम दृष्टि के
१. सुयुक्ता न मुन्युक्तिरप्यत्र शास्त्रे भवेत् कार्यवर्षस्य या हग्निरुद्धा। (सि० त० वि०)
२. वेदास्तावद्यज्ञकर्मप्रवृत्ता यज्ञा प्रोक्तास्ते तु कालाश्रयेण।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्।। (वे० ज्यो०)
३. अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तत्र केवलम्।
प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिणौ।।
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