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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 728 में से

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पृष्ठ 19

( १५ )
सञ्चार का ज्ञान-प्रकार हो, दो प्रकार का ( व्यक्त-अव्यक्त ) गणित हो, उत्तरसहित प्रश्न
हो; पृथ्वी, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का वर्णन हो और यन्त्रादि का वर्णन हो।
सिद्धान्तशिरोमणि द्वारा यही परिभाषा मान्य है—
त्रुट्यादिप्रलयान्तकालकलना मानप्रभेदस्तथा
चारश्च द्युसदां द्विधा च गणितं प्रश्नास्तथा सोत्तराः।
भूधिष्ण्यग्रहसंस्थितेश्च कथनं यन्त्रादि यत्रोच्यते
सिद्धान्तः स उदाहृतोऽत्र गणितस्कन्धप्रबन्धे बुधैः॥
‘गणितस्कन्ध’ उसको कहते हैं, जिसमें व्यक्त-अव्यक्त आदि अनेक प्रकार के
गणित वर्णित हों। यह स्कन्ध सिद्धान्तस्कन्ध के अन्तर्गत ही पाया जाता है।
‘फलितस्कन्ध’ के मुख्य पाँच भेद हैं—जातक, ताजिक, मुहूर्त, प्रश्न एवं संहिता।
जिसमें जन्मकाल के द्वारा प्राणियों के जीवनसम्बन्धी सब तरह के फल कहे गये
हैं, उसको ‘जातक’ कहते हैं। वस्तुतः जन्मकाल के ज्ञान के विना प्राणियों का जीवन
अन्धकार में रहता है—
यस्य नास्ति किल जन्मपत्रिका या शुभाशुभफलप्रदायिनी।
अन्धकं भवति तस्य जीवितं दीपहीनमिव मन्दिरं निशि॥
ताजिकविभाग से वर्षफल, मासफल आदि का ज्ञान होता है।
पूर्वापर सन्दर्भ देखने से यह निश्चित होता है कि यवनों ने ताजिक शास्त्र में विशेष
उन्नति की; अतः ज्यौतिष शास्त्र के प्रवर्त्तकों में यवनाचार्य का भी नाम आता है। ऐसा
जान पड़ता है कि पूर्व समय में अत्रत्य ज्योतिषी लोग वर्षफल आदि अन्य प्रकार से
बनाते थे। नीलकण्ठाचार्य ने यवनों से ताजिक शास्त्र का अध्ययन करके ‘ताजिकनीलकण्ठी’
नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। इसमें योगों के नाम फारसी शब्दों में इक्कवाल, इन्दुवार
आदि हैं। इन शब्दों को बदल कर संस्कृत शब्दों के द्वारा योगों के नाम नहीं लिखे;
अतः यह भी सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में विद्वानों में गुणग्राहकता अत्यधिक थी।
मुहूर्तविभाग में जातकर्म, अन्नप्राशन आदि सकल मुहूर्तों का वर्णन है।
प्रश्नविभाग में मूकप्रश्न आदि का वर्णन है।
संहिताविभाग फलित ज्यौतिष का प्रधान अङ्ग है। इसमें ग्रहचार आदि फलों के
अतिरिक्त वायसविरुत, शिवारुत, मृगचेष्टित, श्वचेष्टित, गवेङ्गित, अश्वेङ्गित, हस्तिचेष्टित,
शाकुन आदि विषयों का फल भी लिखा है; अतः इसको फलित का एक प्रधान अङ्ग
मानना पड़ेगा।
इस विभाग के अन्तर्गत यह ‘बृहत्संहिता’ नामक ग्रन्थ अनुपम है, जिसको आदित्य-
दास के पुत्र, त्रिस्कन्ध ज्यौतिष शास्त्र में पारङ्गत श्री वराहमिहिराचार्य ने बनाया।
इस समय एतद्देशीय सम्पूर्ण संस्कृत विद्यालयों में यह बृहत्संहिता नामक ग्रन्थ
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