बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ )
श्रीमान् भास्कराचार्य—
शब्दशास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी श्रोत्रमुक्तं निरुक्तं च कल्पं करौ।
या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका पादपद्मद्वयं छन्द आद्यैर्बुधैः।।
वेदपुरुष का नेत्ररूप होने के कारण ज्योतिष शास्त्र सभी अङ्गों में उत्तम गिना जाता
है, क्योंकि अन्य सभी अङ्गों से समन्वित प्राणी भी नेत्ररहित होने पर कुछ नहीं कर
सकता।
यहाँ पर भास्कराचार्य—
वेदचक्षुः किलेदं स्मृतं ज्योतिषं मुख्यता चाङ्गमध्येऽस्य तेनोच्यते।
संयुतोऽपीतरैः कर्णनासादिभिश्चक्षुषाङ्गेन हीनो न किञ्चित्करः।।
काश्यप के मत से इस शास्त्र के सूर्य आदि अठारह महर्षि प्रणेता हैं—
सूर्यः पितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः।।
लोमशः पौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः।
शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः।।
किन्तु पराशर के मत से ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तक उन्नीस हैं—
विश्वसृड् नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
लोमशो यवनः सूर्यश्च्यवनः कश्यपो भृगुः।।
पुलस्त्यो मनुराचार्यः पौलिशः शौनकोऽङ्गिराः।
गर्गो मरीचिरित्येते ज्ञेया ज्यौतिःप्रवर्तकाः।।
पराशर के मत से ज्योतिषशास्त्र में गुरु और शिष्य की सम्बन्ध-परम्परा इस प्रकार है—
नारदाय यथा