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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 728 में से

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पृष्ठ 17

भूमिका
तिष्ठन्तीं शववक्षसि स्मितमुखीं हस्ताम्बुजैर्बिभ्रतीं
मुण्डं खड्गवराभयानि विजितारातिव्रजां भीषणाम्।
मुण्डस्रक्प्रविकाशमानविपुलोत्तुङ्गस्तनोद्भासिनीं
नत्वेमां किल भूमिकां वितनुते नन्दोऽच्युतादिः कृती।।
परमेश्वर के सम्बन्ध में शास्त्रों में प्रतिपादित है कि 'अणोरणीयान्महतो महीयान्'
अर्थात् यह परमात्मा छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा है। इस अखण्ड ब्रह्माण्ड-नायक
परमात्मा के निःश्वासभूत, प्राणियों के आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक—इन
तीनों प्रकार के दुःखों का अपहरण करने वाला और चतुर्वर्ग-प्राप्ति का अतिशय सुन्दर
मार्गप्रदर्शक वेद है।
प्राचीन तथा आधुनिक इतिहासों के द्वारा यह सर्वथा सिद्ध हो चुका है कि उपलब्ध
पुस्तकों में सबसे प्राचीन वेद है। इसको अपौरुषेय कहते हैं अर्थात् किसी मनुष्य ने
इसको नहीं बनाया, किन्तु प्राणियों के हित के लिये सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने त्रिकालज्ञ
महर्षियों के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में इसे प्रकाशित किया।
यहाँ पर मनु—
वेदोऽखिलो कर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।
श्लोकवार्तिक में—
श्रेयःसाधनता ह्येषा नित्यं वेदात्प्रतीयते।
ताद्रूप्येण च धर्मत्वं तस्मान्नेन्द्रियगोचरः।।
और भी—
प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।
एवं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता।।
ब्राह्मणों को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये।
यहाँ पर मनु—
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः।।
इसके व्याकरण आदि छः अङ्ग हैं, जैसे—व्याकरण मुख, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त
कान, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द पैर है।
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