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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 728 में से

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पृष्ठ 13

( ९ )
विदेश गये थे या नहीं? यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि वे
खुले मस्तिष्क वाले, उदार दृष्टिकोण एवं विश्वबन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत मनीषी
थे। उनकी यह उदारता एक पद्य से ज्ञात होती है, जिसका भाव यह है कि 'जिसके पास
सम्यक् ( संशयरहित पुष्ट ) ज्ञान होता है, वह ऋषि के समान पूज्य होता है ( वहाँ
जाति का पन्थ बाधक नहीं होता ) और इस प्रकार का ज्ञान यदि किसी विप्र में हो तो
फिर कहना ही क्या है?'१ यहाँ 'म्लेच्छ' शब्द का प्रयोग हीनार्थ-बोधक नहीं है; अपितु
शास्त्रों में वैदिक ( आर्य ) संस्कृति के अतिरिक्त अन्य संस्कृति के अनुयायियों के लिए
इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि आचार्य वराहमिहिर किसी भी
देश, किसी भी जाति एवं किसी भी व्यक्ति से ज्ञानार्जन में परहेज के पक्षधर नहीं थे।
बृहत्संहिता
उपलब्ध संहिताओं में बृहत्संहिता सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं सुव्यस्थित है। इसमें
संगृहीत विषयों को देखने से प्रतीत होता है कि आचार्य वराहमिहिर ने यत्र-तत्र से
महत्त्वपूर्ण विषयों का सङ्कलन कर भावी पीढ़ी के लिये गहन अध्ययन एवं अनुसन्धान
की प्रभूत सामग्री प्रदान की है। आज आवश्यकता है—बृहत्संहिता के प्रत्येक अध्याय
पर पृथक्-पृथक् कार्य ( अनुसन्धान ) करने की; तभी इस ग्रन्थ की सार्थकता अद्यतन
के युग में सिद्ध होगी तथा ज्योतिष शास्त्र को एक नया आयाम प्राप्त हो सकेगा। आचार्य
अत्यन्त दूरदर्शी थे। उन्होंने अपने काल में ही अनुमान लगा लिया था कि भविष्यत्
काल में ज्योतिष शास्त्र अल्पज्ञों एवं पाखण्डियों के हाथों में जाकर अपनी प्रतिष्ठा पर
प्रश्नचिह्न लगा सकता है। इसीलिये उन्होंने इस शास्त्र के अध्येताओं की अर्हता का
प्रतिपादन किया है।
सांवत्सर सूत्राध्याय के १५ पद्यों में आचार्य ने केवल दैवज्ञों का लक्षण निरूपित
किया है। उन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही ज्योतिष शास्त्र पढ़ना चाहिये अथवा जिसे
ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन की जिज्ञासा हो, उस व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने अन्दर उन
गुणों को धारण करना चाहिये।
दैवज्ञ-लक्षण बताने के बाद २२-३९ पद्यों में दैवज्ञों की प्रशंसा तथा पाखण्डियों
की निन्दा की गई है। किसी भी शास्त्र को उपयुक्त, जिज्ञासु एवं प्रबुद्ध व्यक्ति के हाथ
में देने से उसका विस्तार होता है; अन्यथा शास्त्र की हानि होती है। आचार्य ने लिखा
है—'संहितापारगश्च दैवचिन्तको भवति।' विना संहिताओं के सम्यग् अध्ययन के
व्यक्ति दैवचिन्तक नहीं हो सकता। प्रकृति और भावी घटनाओं को जानने के लिये
अन्तरिक्ष में प्रतिक्षण हो रहे परिवर्तनों पर दृष्टि रखना आवश्यक है। अतः आचार्य ने
सर्वप्रथम पात्रता-निर्धारण के अनन्तर सूर्यादि ग्रहों, अगस्त्य तारा तथा सप्तर्षि मण्डल
१. म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यग् ज्ञानं प्रतिष्ठितम्।
ऋषिवत्तेऽपि पूज्यन्ते किं पुनर्देवविद् द्विजः।। ( बृ० सं०-२.३० )
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