बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संहिता स्कन्ध में बृहत्संहिता या वाराही संहिता उल्लेखनीय है। अद्यावधि उपलब्ध
संहिताओं में बृहत्संहिता की अप्रतिम प्रतिष्ठा है। संक्षेप में अधिकाधिक विषयों का
समावेश इस ग्रन्थ में आचार्य ने किया है।
इसी प्रकार होरास्कन्ध में वराहविरचित 'बृहज्जातक' की प्रतिष्ठा है। आचार्य भट्टोत्पल
ने वराह की दोनों कृतियों—बृहत्संहिता और बृहज्जातक पर अपनी सुप्रसिद्ध टीका
लिखी है, जो 'भट्टोत्पल' के नाम से ही जानी जाती है।
आचार्य वराहमिहिर का जन्म अवन्ती ( उज्जैन ) के पास कापित्थक नामक स्थान
में हुआ था। इनके पिता कर नाम आदित्य दास था। ये सूर्य के उपासक थे। इसके
आधार पर ये मगद्विज कुल में उत्पन्न थे। ये सभी सूचनायें वराहमिहिर द्वारा लिखित
बृहज्जातक के एक पद्य¹ के आधार पर प्राप्त होती हैं। आज के पुरातात्त्विक साक्ष्य भी
अवन्ती के पास ही इनके जन्मस्थान की पुष्टि करते हैं। इन्होंने अपने कुल एवं जन्म-
स्थान का तो उल्लेख किया है; किन्तु जन्मकाल का उल्लेख नहीं किया है। अतः
पञ्चसिद्धान्तिका² में उल्लिखित शक ४२७ के आधार पर इनका जन्मसमय शक
४०७-४१२ ( सन् ४८५-४९० ) के बीच माना जाता है। ज्योतिर्विदाभरण में जिस
वराहमिहिर का उल्लेख है, वे कोई अन्य हो सकते हैं अथवा काल्पनिक भी हो सकते
हैं; क्योंकि विक्रमादित्य के नवरत्नों में जिन आचार्यों के नाम हैं, उनकी एक कालावधि
में उपस्थिति सम्भव नहीं है। स्वयं ज्योतिर्विदाभरण के लेखक ने अपनी ही लेखनी से
अपने-आपको सन्देह के घेरे में डाल दिया है। अतः निःसंशय ही पञ्चसिद्धान्तिका के
वराहमिहिर ज्योतिर्विदाभरण में उल्लिखित वराहमिहिर से सर्वथा भिन्न हैं।
इनके तिरोधान का काल सन्दिग्ध है। एक अज्ञात लेखक के आयुष्य विवरण के
आधार पर इनका देहावसान शक ५०९ में हुआ।³ निश्चित तिथि ज्ञात न होने पर भी
कृतियों के आधार पर यह निश्चित ही है कि पाँचवी शताब्दी के ये मूर्धन्य खगोलशास्त्री
थे। इनके ज्ञान तथा इनके द्वारा प्रयुक्त शब्दावलियों के आधार पर इनके विषय में श्रुति
है कि इन्होंने विदेशों में भ्रमण करके भी ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया था। कुछ
इतिहासकारों का मत है कि ये विदेशों में भ्रमण नहीं किये थे; अपितु इनके समय तक
देश और विदेशों में ज्ञान का आदान-प्रदान हो चुका था। इनके
पूर्ववर्ती साहित्य में भी विदेशी शब्दों के उल्लेख मिलते हैं।⁴ आचार्य वराहमिहिर
१. आदित्यदासतनयस्तदवाप्तबोधः कापित्थके सवितृलब्धवरप्रसादः।
आवन्तिको मुनिमतान्यवलोक्य सम्यग्घोरां वराहमिहिरो रुचिरां चकार।।
( बृ० जा० उप०, अ०-९)
२. सप्ताश्वि वेदसङ्ख्यम्।
३. नवाधिकपञ्चशतसङ्ख्यशाके वराहमिहिराचार्यो दिवङ्गतः।। ( भारतीय ज्योतिष )
४. द्रष्टव्य—भारतीय ज्योतिषं।