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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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( ७ )
था तो उस समय चन्द्रमण्डल पर क्षणिक प्रकाश दिखलाई दिया, जिसको देखकर
आश्चर्यचकित नील आर्मस्ट्रांग ने पृथिवी पर स्थित अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र को
इसकी सूचना दी। सभी के लिये यह क्षणिक प्रकाश एक रहस्य था। ऐसी ही एक
घटना का उल्लेख पैट्रिक मूरे ने भी अपनी पुस्तक Guide to the Moon में किया
है कि 'जब मैंने अपने दूरदर्शक से चन्द्रमा को देखा तो कुछ क्षण के लिए चन्द्रविम्ब
नीले प्रकाश से युक्त दिखाई दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे नीले बल्ब के
प्रकाश में चन्द्रमा को देख रहा हूँ; किन्तु यह दृश्य कुछ ही क्षणों के बाद समाप्त हो
गया तथा चन्द्रमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देने लगा।' १
इस तरह के क्षणिक परिवर्तन निश्चय ही आश्चर्योत्पादक हैं; किन्तु इन विचित्र
घटनाओं से संहिताकार भी अपरिचित नहीं हैं। उन्होंने बड़े ही सहज भाव में लिख
दिया है कि 'चन्द्रविम्ब पर कभी पीला, कभी नीला, कभी हरा क्षणिक प्रकाश होता
रहता है।' २ इन प्रकाश-परिवर्तनों के प्रभावों का भी उल्लेख किया है; परन्तु इस प्रकार
के प्रकाशों का कारण आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है। संहिताग्रन्थों को देखने से
प्रतीत होता है कि आधुनिक युग में भी अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर गहन शोध के
अपार अवसर उपलब्ध हैं। इनके उल्लेख की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है; यतः
संहिताग्रन्थ स्वयं में ही प्रमाण हैं।
वराहमिहिर
आचार्य वराहमिहिर ज्योतिष शास्त्र के प्रतिनिधि आचार्य हैं। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र
के तीनों स्कन्धों पर अद्वितीय कार्य किया है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस प्रकार
भगवान् वराह ने रसातल से पृथ्वी को उबार कर बाहर लाया, उसी प्रकार कालप्रवाह
में निमग्न ज्योतिष के सिद्धान्त स्कन्ध को इन्होंने उबारा। अपने मानक ग्रन्थ 'पञ्च-
सिद्धान्तिका' में इन्होंने सौर, पैतामह, वसिष्ठ, रोमक और पौलिश सिद्धान्तों का संग्रह
किया तथा उनकी गुणवत्ता को परख कर उन पर अपनी टिप्पणी भी दी; जो इस प्रकार
है—'पौलिश सिद्धान्त स्पष्ट है। उसी के आसन्न रोमक भी है; किन्तु सौर सिद्धान्त
इससे भी शुद्ध ( स्पष्टतर ) है। अन्य दो ( पैतामह और वसिष्ठ ) अत्यन्त ( प्राचीन
होने से ) भ्रष्ट हो गये हैं।
१. The Moon is shining down from a slightly misty sky with a lovely
shimmering blueness like an electric glimmes, utterly unlike any-
thing I have never seen before.
२. विलग्नमध्यो नीलाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः।
मध्यच्छिद्रविलीनाभो भयं कारयते महत्।।
हरितो पीतये विद्यात् पशूनां चाप्युपद्रवम्।
पीतवर्णो गजान् हन्ति पीतो व्याधिकरस्तथा।। ( अद्भूतसागर )
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