बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्यायः १५
प्रकृतिः क्षोभमापन्ना पुरुषाख्ये जगद्गुरौ । महान्प्रादुरभूद् बुद्धिस्ततोऽहं समवर्त्तत ॥३१॥
अहङ्काराच्च सूक्ष्माणि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । तन्मात्रेभ्यो हि जातानि भूतानि जगतः कृते ॥३२॥
आकाशवाय्वग्निजलभूमयोऽब्जभवात्मज । यथाक्रमं कारणतामेकैकस्योपयान्ति च ॥३३॥
ततो ब्रह्मा जगद्धाता तामसानसृजत्प्रभुः । तिर्यग्योनिगताञ्जन्तून्पशुपक्षिमृगादिकान् ॥३४॥
तमप्यसाधकं मत्वा देवसर्गं सनातनात् । ततो वै मानुषं सर्गं कल्पयामास पद्मजः ॥३५॥
ततो दक्षादिकान्पुत्रान्सृष्टिसाधनतत्परान् । एभिः पुत्रैरिदं व्याप्तं सदेवासुरमानुषम् ॥३६॥
भूर्भुवश्च तथा स्वश्च महश्चैव जनस्तथा । तपश्च सत्यमित्येवं लोकाः सत्योपरि स्थिताः ॥३७॥
अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम् । महातलं च विप्रेन्द्र ततोऽधश्च रसातलम् ॥३८॥
पातालं चेति सप्तैव पातालानि क्रमादधः । एष सर्वेषु लोकेषु लोकनाथांश्च सृष्टवान् ॥३९॥
कुलाचलान्नदींश्चासौ तत्तल्लोकनिवासिनाम् । वर्त्तनादीनि सर्वाणि यथायोग्यमकल्पयत् ॥४०॥
भूतले मध्यगो मेरुः सर्वदेवसमाश्रयः । लोकालोकश्च भूम्यन्ते तन्मध्ये सप्त सागराः ॥४१॥
दीपाश्च सप्त विप्रेन्द्र द्वीपे द्वीपे कुलाचलाः । बाह्या नद्यश्च विख्याता जनाश्चामरसन्निभाः ॥४२॥
जम्बूप्लक्षामिधानौ च शाल्मलश्च कुशस्तथा । क्रौञ्चशाकौ पुष्करश्च ते सर्वे देवभूमयः ॥४३॥
एते द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः । लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिक्षीरजलैः समम् ॥४४॥
एते द्वीपाः समुद्राश्च पूर्वस्मादुत्तरोत्तराः । ज्ञेया द्विगुणविस्तारा लोकालोकाच्च पर्वतात् ॥४५॥
जगद्गुरु के द्वारा प्रकृति क्षोभ से युक्त हो जाती है अर्थात् जब लोक-सृष्टि की इच्छा से प्रकृति (गुणों की
साम्यावस्था) में कम्पन उत्पन्न होता है तब महत्तत्त्व (बुद्धि) उत्पन्न होता है और तत्पश्चात् अहङ्कार की उत्पत्ति
होती है। अहङ्कार से पाँच तन्मात्राओं (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द) और एकादश इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई ।
तन्मात्राओं से जगत् की सृष्टि के लिए पाँच महाभूत उत्पन्न हुए ।२८-३२।ब्रह्मा के पुत्र (नारद) ! आकाश, वायु, अग्नि,
जल और भूमि यथाक्रम एक दूसरे के प्रति कारण होते जाते हैं अर्थात् शब्द तन्मात्रामक आकाश से वायु, शब्द-
स्पर्शतन्मात्रामक वायु से अग्नि, अग्नि से रसतन्मात्रामक जल और जल से पृथ्वी की सृष्टि हुई । तदनन्तर
जगत्स्रष्टा प्रभु ब्रह्मा ने सबसे पहले तामस सृष्टि की और तिर्यग्योनिगत जन्तुओं, पशु, पक्षी और मृग आदि को
बनाया। उस प्रथम सृष्टि को असाधक (मन के प्रतिकूल) समझकर सनातन ब्रह्म से देव-सृष्टि की । तत्पश्चात् उस
पद्मसम्भव ब्रह्मा ने मानव सृष्टि को प्रारम्भ किया । ३३-३५। प्रारम्भ में सृष्टि कार्य में तत्पर रहने वाले दक्ष आदि
मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। इन पुत्रों से ही देवता से लेकर असुर और मानवों को सम्पूर्ण सृष्टि हुई है। भूः,
भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य ये सात लोक सत्य पर अवलम्बित तथा ऊर्ध्व लोक हैं। विप्रेन्द्र ! अतल,
वितल, सुतल, तलातल, महातल उसके नीचे रसातल और सबसे नीचे पाताल है । इस प्रकार क्रमशः ये सातों
पाताल लोक भू लोक के नीचे स्थित हैं। पुनः ब्रह्मा ने सब लोकों में लोक-पालों की रचना की । प्रत्येक लोक में
कुलाचल, नदी ओर उन लोकों में रहने वाले जीवों एवं लोकोचित व्यवहार आदि को यथायोग्य बनाया । भूतल
के मध्य भाग में सब देवताओं के एकमात्र आश्रय स्थान मेरु को, भूमि के अन्त में लोकालोक पर्वत को और मध्य
में सात सागरों को स्थापित किया ॥३६-४१॥
विप्रेन्द्र ! पुनः सात द्वीप, प्रत्येक द्वीप में कुलाचल प्रवाहयुक्त अति प्रसिद्ध नदियों और देवतुल्य मनुष्यों की
रचना की । जम्बूद्वीप, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर द्वीप ये सभी देवभूमियाँ हैं। ये सातों द्वीप
सात-सात समुद्रों से घिरे हुए हैं जो कि क्रमशः लवण, इक्षु (ईख) सुरा (मदिरा) घृत, दधि, दूध और जल से भरे
रहते हैं। ये द्वीप और समुद्र लोकालोक पर्वत से पूर्व एक के बाद एक स्थित हैं जो क्रमशः विस्तार में दुगुने