बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा ।
गौतमाख्यानकं पश्चाद् वेदपादस्तवस्ततः ॥
गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं नर्मदातीर्थवर्णनम् ।
अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ।
वृन्दावनस्य महिमा वसोर्द्धान्तिके गतिः ।
फलश्रुति--
यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः ।
स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥
यस्त्वेतादिषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकाचितम् ।
प्रदद्याद् द्विजवर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥
यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् ।
शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गगतिं लभेत् ॥
(ना० पु० पूर्वभाग, अ० ६७)
इस प्रकार नारदीयपुराण ने जहाँ अपने विषयों की अनुक्रमणी दी है वहीं अठारहों पुराणों की भी
विस्तृत विषयानुक्रमणिका प्रस्तुत की है। यह अनुक्रमणी सभी पुराणों के विषयों को जानने के लिए अत्यन्त
आवश्यक है। इसकी सहायता से हम वर्तमान पुराणों के मूलरूप तथा प्रक्षिप्त अंश की छानबीन बड़ी सुग-
मता से कर सकते हैं। इस पुराण में विविध ज्ञान-विज्ञान की बातें, अनेक इतिहास-गाथायें, गोपनीय अनुष्ठान
आदि का वर्णन, धर्मनिरूपण तथा भक्तिमहत्त्वपरक विलक्षण कथायें, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, मन्त्र-विज्ञान
आदि का अलौकिक और महत्त्वपूर्ण व्याख्यान संगृहीत है।
यद्यपि सभी पुराण श्रीहरि के स्वरूप ही हैं। फिर भी छह पुराण सात्त्विक माने जाते हैं। वे ये हैं—
वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् ।
गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शने ॥
सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि शुभानि वै ।
(पद्मपुराण उत्तरखण्ड, २६३।८२-८३)
अतएव नारदीय पुराण सात्त्विक पुराण है। इसमें परात्पर ब्रह्म विशुद्ध सत्त्वमूर्ति श्रीहरि की लीलाओं
का गायन हुआ है। यह पुराण 'भक्त्या तुष्यति माधवो न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः' इस सिद्धान्त का परि-
पोषक है। यह कहता है—
यथा भूमि समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।
तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥
(पूर्वभाग ४।५)
किन्तु इस पुराण की दृष्टि में भक्ति के साथ वर्णाश्रमधर्म एवं शास्त्रोक्त कर्त्तव्यों का पालन भी अत्या-
वश्यक है। सदाचारपरायण, भवाचारत्यागी भक्त पर भगवान् कभी प्रसन्न नहीं होते—