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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 1008 में से

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सूर्यास्त के समय जगत् की स्थिति पाषाण-जैसी ही रहती है। अर्थात्, उस समय न प्रकाश ही रहता है, न
गौतम अर्थात् अन्धकार ही।
इसी प्रकार राजपत्नी का अश्व के साथ शयन, विष्णु-वृन्दा-वृत्तान्त, अगस्त्य का समुद्र-पान आदि का
रहस्य न जानने से लोग आशंका करते हैं। इन सबका उत्तर 'पुराण-परिशीलन' में द्रष्टव्य है। अतएव पूर्ण
जानकारी के बिना अल्प ज्ञान के आधार पर पुराणों पर छींटाकशी करना अनुचित है।
पुराण-साहित्य महनीय है। पुराणों से ही भारतीय जीवन का आदर्श, भारत की सभ्यता, संस्कृति
तथा भारत के विद्या-वैभव के उत्कर्ष का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। पुराण न केवल साहित्य हैं
अपितु इनमें विश्वकल्याणकारी त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) उन्नति का मार्ग भी
प्रदर्शित किया गया है। अतएव दुराग्रह एवं पक्षपात से रहित होकर पुराण-साहित्य का अध्ययन करना
सबके लिए कल्याणकारी है। आगे अब प्रस्तुत पुराण का परिचय दिया जा रहा है।
पुराण-रचयिता
अष्टादशपुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः (महाभारत, आदिपर्व), अष्टादश पुराणानां वक्ता सत्यवती-
सुतः (शिवपुराण, रेवाखण्ड)—इत्यादि प्रमाणों से अठारहों पुराणों के रचयिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास माने
जाते हैं। स्वयं ब्रह्मा प्रत्येक द्वापर युग के अन्त में और कलियुग के आरम्भ में व्यास के रूप में अवतीर्ण
होकर अष्टादशपुराणों को सम्पादित, निर्मित एवं ग्रन्थित करते हैं। इस वाराहकल्प में द्वापर युगों की
संख्या के अनुसार अब तक २८ व्यास हो चुके हैं। अन्तिम व्यास का नाम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास था जिनकी
अवशिष्ट शास्त्र-कृतियाँ आज सौभाग्यवश हमें प्राप्य हैं। २६ वें द्वापर में अर्थात् आगामी समय मे जो व्यास
होंगे, उनका नाम होगा श्री अश्वत्थामा व्यास।
श्रीव्यास जी का परिचय हमारे पुरातन साहित्य में विस्तार के साथ आया है। संक्षेप में व्यास का स्वरूप
समझ लेना ही यहाँ पर्याप्त है। पुराणवर्म में पं० कालूराम शास्त्री ने लिखा है—
व्यास कोई एक व्यक्ति नहीं होता, प्रत्येक द्वापर में नवीन व्यास हुआ करते हैं। व्यास किसी का नाम
नहीं, किन्तु पदवी है। गोलवृत्त में जो एक सीधी रेखा निकल जाती है, उसका नाम व्यास है। इसी प्रकार वेदवृत्त
में जो सीधा निकल जाय उसका नाम वेदव्यास है। जितने व्यास हुए हैं, वे वेद और पुरातत्त्व के पूर्ण ज्ञाता
हुए हैं।
नारदीयपुराण
नारदोक्त पुराण ही 'नारदीय' नाम से प्रख्यात है—'नारदोक्तं पुराणं तु नारदीयं प्रचक्षते' (शिवउप-
पुराण) नारद ने बृहत्कल्पप्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, वही २५००० श्लोकों में ग्रथित
होकर नारदीयमहापुराण बना है—
यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च ।
पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते ॥
(मत्स्यपुराण ५३।२३)
किन्तु वर्तमान नारदीयपुराण में ३००० श्लोकों की कमी है, २२००० श्लोक ही मिलते हैं। इस पुराण
के पूर्वभाग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—इन चार ब्रह्मपुत्रों का ब्रह्मपुत्र नारद के प्रति कथन
है। किन्तु ऐसा भी माना जाता है कि नारद का ही अपने उक्त चारों भाइयों के प्रति कथन है, ऊपर आये हुए
शिवउपपुराण और मत्स्यपुराण के वचनों से यही सिद्ध होता है। नारदीयपुराण में क्या विषय है ? इसका संक्षेप
में इसी पुराण ने उत्तर दे दिया है—