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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 1008 में से

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इतना कहकर आगे अठारह पुराणों के नाम, संख्या आदि का वर्णन किया ।
इस प्रकार वेद-प्रतिपादित पुराण सर्वथा प्रामाणिक हैं और इनमें प्रतिपादित भगवान् के सगुणावतारों
की कथायें भी वेदमूलक होने से प्रमाणिक हैं । वेदमंत्रों में अवतारों का उल्लेख है—
जो लोग वेद को परम प्रमाण मानते हैं, किन्तु तन्मूलक अवतारवाद को नहीं मानते, उन्हें वेद-मंत्रों
में अवतारों का उल्लेख देखकर निर्णय करना चाहिए—
तैत्तिरीयसंहिता में वाराहावतार—‘आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत्तस्मिन् प्रजापतिर्वायुर्भूत्वाऽचरत्स
इमामपश्यत्तं वराहो भूत्वाऽहरत्’ । तैत्तिरीय ब्राह्मण में—‘स वराहो रूपं कृत्वोपन्यमज्जत स पृथिवीमध
आर्छत्’ । ऐतरेय ब्राह्मण में परशुरामावतार—‘प्रोवाच रामो भार्गवेयो विश्वान्तरायः’ । छान्दोग्य
में कृष्णावतार—‘कृष्णाय देवकीपुत्राय’ । तैत्तिरीयारण्यक में—‘नारायणाय विद्महे वासुदेवाय
धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।’ ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में—‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः
पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ।’ प्र तद्विष्णुस्तव
ते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ।’ उसी
सूक्त में—‘इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे । त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा
अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् । शतपथब्राह्मण में—‘वामनो ह विष्णुरास तद्देवा न जिहीडिरे महद्वै नोऽदुर्यं
नो यज्ञसंमितमदुरिति । रुद्र का वर्णन अथर्ववेद—११ काण्ड २ प्रपाठक ६६ मन्त्र में—‘नमस्ते रुद्र मन्यव उतो
त इषवे नमः । बाहुभ्यामुत ते नमः ।।’ तैत्तिरीयारण्यक में—‘नमो हिरण्यबाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय
हिरण्यपतयेऽम्बिकापतय उमापतये पशुपतये नमो नमः ।’ देवी का वर्णन ऋग्वेद और अथर्ववेद में—‘अहं रुद्रे-
भिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।’ इत्यादि ।
गणपति का वर्णन ऋग्वेद में—‘गणानां त्वा गणपतिं हवाहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा
निधिपतिं हवामहे व्वसो मम । अहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।’
इसी प्रकार सूर्यादि अन्य देवों का वर्णन भी मन्त्रों में मिलता है । अतएव वेदादि में ग्रथित देव-
चरित्रों का उपवृंहण पुराणों में देखकर पुराणोक्त देवकथा को अमूल कहना हास्यास्पद है ।
मत्स्यपुराण ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि ब्रह्मा ने सभी शास्त्रों से पहले पुराणशास्त्र का स्मरण किया,
पश्चात् उनके मुख से वेद निकले—
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।।
इससे पुराण की प्राचीनता वेद से भी अधिक सिद्ध होती है । इतना ही नहीं, प्रस्तुत नारदीय पुराण
वेद के अर्थ से पुराण के अर्थ को कहीं अधिक मानता है और इसीलिए समग्र वेदों को पुराणों में ही प्रतिष्ठित
स्वीकारता है—
वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्यं वरानने ।
वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेव सर्वदा ।।
(ना० पु० २।२४।१७)
फिर नारदीय पुराण वेद, स्मृति तथा पुराण के विषय तथा क्षेत्र के विभाग को दिखलाते हुए कहता
है—वेद का क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। वेद का प्रधान क्षेत्र है यज्ञकर्म का सम्पादन—इसी कार्य में वेद का महनीय