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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 1008 में से

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( २ )
करके अंग समेत चार वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र को ग्रहण कर लिया । पुनः कल्प के
आदि में मत्स्यरूप धारण करके मैंने जलार्णव में जल के भीतर ही अशेष वेद, पुराणादि को कह डाला, जिसे
सुनकर ब्रह्मा ने मुनियों को बता दिया ।
इस प्रकार मत्स्यपुराण में मत्स्यावतार भगवान् ने उक्त बातें कहकर आगे किस-किस ने किस-किस को
कौन-कौन पुराण सुनाया, यह कहा । इसी प्रकार रेवामाहात्म्य में भी कहा गया है—
पुराणमेकमेवासीदस्मिन्कल्पान्तरे नृप ।
त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।।
स्मृत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवश्चतुर्मुखः ।
प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।।
कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप ।
व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।।
चतुर्लक्षप्रमाणेने द्वापरे द्वापरे सदा ।
तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।।
अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् ।
तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षसंक्षेपेण निवेशितः ।।
पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते ।'
अर्थात् पहले सौ करोड़ श्लोकों में ग्रथित एक ही पुराण था । उसका स्मरण कर ब्रह्मा ने मुनियों को
उपदेश दिया । तब सभी शास्त्रों और पुराणों की प्रवृत्ति हुई । राजन् ! पुराण का समय से ग्रहण करना
दुष्कर समझकर भगवान् ने व्यास का रूप धारण करके प्रत्येक पुराण का संक्षेप कर दिया । प्रत्येक द्वापर
में चार लाख श्लोकों के प्रमाण से उसे १८ भागों में परिणत किया । आज भी देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों
वाला पुराण विद्यमान है । उसके अर्थ को चार लाख श्लोकों में संक्षेप से सन्निविष्ट किया गया है । वही
अठारह पुराणों के रूप में सम्प्रति उपलब्ध है ।
प्रस्तुत नारदीय पुराण में भी ब्रह्मा ने मरीचि से उक्त प्रकार की बातें कहीं हैं—
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् ।
यस्मिन्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ।।
पुराणमेकमेवासीत् सर्वकल्पेषु मानद ।।
चतुर्वर्गस्य बीजस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।।
प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः ।
कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ।
हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे ।
चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ।।
तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि ।
अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ।।
अस्यैव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते ।