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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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प्रास्ताविक
पुराण
पुराण उस शास्त्र को कहते हैं, जो संसार की पूर्वावस्था का निरूपण करे, व्यास आदि मुनियों के
द्वारा प्रणीत हो, वेदार्थों के वर्णन में निरत हो और 'सर्गश्च प्रतिसर्गश्च'—इत्यादि पाँच लक्षणों से युक्त हो ।
अर्थात् यह सृष्टि किससे किस प्रकार हुई ? इसका लय कहाँ और कैसे होगा ? सृष्टि के पदार्थों की उत्पत्ति का
क्रम किस प्रकार है या मानव-जाति के प्रमुख ऋषि और राजा किस क्रम से अधिकारा रूढ़ हुए ? उनके चरित्र
कैसे थे ? और इस सृष्टि एवं प्रलय के बीच समय कितना लगता है ?—इन पाँच बातों का ज्ञान जिस शास्त्र
से प्राप्त हो, वही पुराण शास्त्र है । यह पुराण शास्त्र वेदों में भी उल्लिखित है । देखिए प्रमाण—
'ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं सह यजुषा । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।।' अथर्व०
(का० ११।६।२४) तथा 'स बृहतीं दिशमनुव्यचलत्तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन् ।
इतिहासस्य च वै सपुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनाञ्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद' अथर्व० (का० १५
अनु० १ प्र० ६ मं० १२) । सामवेदीयगोपथब्राह्मण—'एवमिमं सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः
सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सेतिहासाः सान्वाख्याताः सपुराणाः सस्वराः इत्यादि गोपथपूर्वभाग (२ प्र०) ।
छान्दोग्योपनिषद्—'स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं
वेदानां वेदम्' (छा० उ० प्र० ७ ख० १) । 'एवं विद्वान् वाकोवाक्यमितिहासः पुराणमित्यहरहः स्वाध्यायमधी-
ते त एनं तृप्तास्तर्पयन्ति सर्वैः कामैः सर्वैर्भागैः' (शतपथब्रा० ११।५।७।६) ।
ऊपर के सभी वेद-वाक्यों में पुराण की चर्चा सुस्पष्ट है । अतएव जो लोग केवल वेद को ही मानते हैं,
पुराण को नहीं, उन्हें इन वाक्यों का चिन्तन करना चाहिए । आगे हम बतायेंगे कि किसी माने में पुराण वेद
से भी प्राचीन है । यह पुराणशास्त्र पूर्व काल में एक ही था १८ नहीं । जैसा कि मत्स्यपुराण के तिरपनवें
अध्याय में कहा है—
पुराणमेकमेवासीत्तदा कल्पान्तरेऽनघ ।
त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।।
निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया ।
अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम् ।।
मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम् ।
मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे ।।
अशेषमेतत्कथितमुदकान्तर्गतेन च ।
श्रुत्वा जगाद च मुनीन्प्रति देवश्चतुर्मुखः ।।
अर्थात् हे निष्पाप ! दूसरे कल्प में एक ही पुराण था, जो धर्म और काम का साधक था और सौ
करोड़ श्लोकों में उसका विस्तार था । जब सभी लोक दग्ध हो गये तब मैंने (भगवान् ने) अश्व का रूप धारण