बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 608 of 1402
Read in context| ६०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| विद्यायाः, विरुद्धधर्मदर्शित्वात् सर्वत्र।<br><br>तस्मात्तत्र य एव श्रुत्याचार्यदर्शितमार्गानुसारिणः, त एवाविद्यायाः पारमधिगच्छन्ति। त एव चास्मान्मोहसमुद्रादगाधादुत्तरिष्यन्ति, नेतरे स्वबुद्धिकौशलानुसारिणः ॥ १५ ॥ | उन्हें सर्वत्र विरुद्ध धर्म ही दिखायी देता है।<br><br>अतः उनमें जो श्रुति और आचार्यके दिखाये हुए मार्गका अनुसरण करनेवाले हैं, वे ही अविद्याका पार पाते हैं और वे ही इस अगाध मोहसमुद्रसे तर जायंगे, दूसरे लोग, जो अपने बुद्धिकौशलका अनुसरण करनेवाले हैं, उसे नहीं तर सकेंगे ॥ १५ ॥ |
दध्यङ्ङाथर्वणद्वारा अश्विनीकुमारोंको मधुविद्याके उपदेशकी आख्यायिका
| [ब्रह्मविद्यास्तुति-लिङ्गानामुपन्यासः]<br>परिसमाप्ता ब्रह्मविद्यामृतत्वसाधनभूता, यां मैत्रेयी पृष्टवती भर्तारम् ‘यदेव भगवानमृतत्वसाधनं वेद तदेव मे ब्रूहि’ इति। एतस्या ब्रह्मविद्यायाः स्तुत्यर्थेयमाख्यायिका आनीता। तस्या आख्यायिकायाः सङ्क्षेपतोऽर्थप्रकाशनाथैवेतौ मन्त्रौ भवतः। एवं हि मन्त्रब्राह्मणाभ्यां स्तुतत्वात् अमृतत्वसर्वप्राप्तिसाधनत्वं ब्रह्मविद्यायाः प्रकटीकृतं राजमार्ग- | जिसके विषयमें मैत्रेयीने अपने पतिसे पूछा था कि ‘श्रीमान् जो भी अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मेरे प्रति कहिये,’ वह अमृतत्वकी साधनभूता ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। इस ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह (आगे कही जानेवाली) आख्यायिका प्रस्तुत की जाती है। उस आख्यायिकाके तात्पर्यको संक्षेपसे प्रकाशित करनेके लिये ये दो मन्त्र हैं। इसी प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा स्तुत होनेके कारण ब्रह्मविद्याका अमृतत्व एवं सर्वप्राप्तिका साधनत्व प्रकट किया गया है तथा उसे राजमार्गको प्राप्त कराया गया |