Skip to content
SarvaKosh
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 607 of 1402

Read in context
Page 607

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९


| १४।२) इत्यादि। आथर्वणे च “सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च” (मु० उ० ३।१।७)। कठवल्लीष्वपि “अणोरणीयान् महतो महीयान्” (१।२।२०) “कस्तं मदामदं देवम्” (१।२।२१) “तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्” (ई० उ० ४) इति च। तथा गीतासु “अहं क्रतुरहं यज्ञः” (९।१६) “पिताहमस्य जगतः” (९।१७) “नादत्ते कस्यचित् पापम्” (५।१५) “समं सर्वेषु भूतेषु” (१३।२७) “अविभक्तं विभक्तेषु” (१८।२०) “ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च” (१३।१६) इत्येवमाद्यागमार्थं विरुद्धमिव प्रतिभान्तं मन्यमानाः स्वचित्तसामर्थ्यादर्थनिर्णयाय विकल्पयन्तः, अस्त्यात्मा नास्त्यात्मा कर्ताकर्ता मुक्तो बद्धः क्षणिको विज्ञानमात्रं शून्यं चेत्येवं विकल्पयन्तो न पारमधिगच्छन्त्य- | (मुण्डक) उपनिषद्में कहा है—“वह सर्वज्ञ, सर्ववित् है”, “वह दूरसे भी दूर और यहाँ समीपमें भी है।” कठवल्लियोंमें भी कहा है—“वह अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् आत्मा…”, “उस हर्षसहित और हर्षरहित देवको।” [ईशोपनिषद्में कहा है—] वह स्वयं स्थिर रहकर ही अन्य सब दौड़नेवालोंसे आगे पहुँचा रहता है।” तथा गीतामें भी कहा है—“मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ”, “मैं इस जगत्‌का पिता हूँ”, “वह किसीके पाप [और पुण्य] को ग्रहण नहीं करता” “जो समस्त भूतोंमें परमेश्वरको समभावसे स्थित (देखता है)”, “पृथक्-पृथक् भूतोंमें अखण्ड रूपसे स्थित” “वह सबका संहार करनेवाला तथा सबको उत्पन्न करनेवाला है-ऐसा जानना चाहिये” इत्यादि प्रकारके शास्त्राभिप्रायको विरुद्ध-सा भासनेवाला मानकर अपने चित्तके सामर्थ्यसे अर्थ-निर्णय करनेके लिये तरह-तरहकी कल्पना करते हुए तथा ‘आत्मा है, आत्मा नहीं है, वह कर्ता है, वह अकर्ता है, मुक्त है, बद्ध है, क्षणिक विज्ञानमात्र है, शून्य है’ इत्यादि विकल्प करते हुए अविद्याका पार नहीं पाते; क्योंकि |