बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ४ ॥
यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-प्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ४ ॥
| तथा वायुः । अध्यात्मं प्राणः। भूतानां शरीरारम्भकत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तदन्तर्गतानां तेजोमयादीनां करणत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तथा चोक्तम् "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निः" (१।५।११) इति ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार वायु मधु है। अध्यात्ममधु प्राण है। प्राणियोंके शरीरोंके आरम्भकरूपसे उनका उपकारक होनेके कारण यह मधु है । उसके अन्तर्गत जो तेजोमयादि हैं, उनका मधुत्व उसके करणरूपसे उपकारक होनेके कारण है। ऐसा ही कहा भी है—"उस वाणीका पृथिवी शरीर है और यह अग्नि तेजोरूप है" ॥ ४ ॥ |
अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ५ ॥
यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह