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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 593 of 1402

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Page 593

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५


यश्चायमध्यात्मꣳ रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ २ ॥

ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं। इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ २ ॥

| तथा आपः। अध्यात्मं रैतस्यपां विशेषतोऽवस्थानम् ॥ २ ॥ | इसी प्रकार जल मधु है। अध्यात्म (शरीरके अन्तर्गत) रेतस् में जलकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ २ ॥ |


अयर्माग्नः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि
भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो
यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो-
ऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ ३ ॥

यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ३ ॥

| तथा अग्निः। वाचि अग्नेर्वि-शेषतोऽवस्थानम् ॥ ३ ॥ | इसी प्रकार अग्नि मधु है। वाणीमें अग्निकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ ३ ॥ |


अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि
भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो