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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 577 of 1402

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Page 577

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६९


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
चेत्यर्थः; लौकिकं तु यद्यपि महद्भवति, स्वप्नमायाकृतं हिमवदादिपर्वतोपमं न परमार्थवस्तु; अतो विशिनष्टि—इदं तु महच्च तद्भूतं चेति। अनन्तं नास्यान्तो विद्यत इत्यनन्तम्; कदाचिदापेक्षिकं स्यादित्यतो विशिनष्ट्यपारमिति विज्ञप्तिर्विज्ञानम्, विज्ञानं च तद्घनश्चेति विज्ञानघनः, घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः—यथा सुवर्णघनोऽयोघन इति; एवशब्दोऽवधारणार्थः—नान्यज्जात्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यर्थः।पारमार्थिक है; [ इसलिये महद्भूत है ]। यद्यपि हिमालयादि पर्वतोंके समान लौकिक वस्तु भी महान् होती है; किंतु वह स्वप्न या मायाके समान है, परमार्थवस्तु नहीं। इसीसे श्रुति इसे विशेषित करती है कि यह महत् है और भूत भी है। अनन्त अर्थात् इसका अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त है। कदाचित् इसकी अनन्तता आपेक्षिक हो, इसलिये ‘अपारम्’ ऐसा विशेषण देती है। विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, जो विज्ञान हो और घन हो उसे विज्ञानघन कहते हैं। यहाँ घनशब्द [विज्ञानमें] अन्य जातिकी वस्तुका निषेध करनेके लिये है; जैसे कि सुवर्णघन, लोहघन आदि। ‘एव’ शब्द निश्चयार्थक है। तात्पर्य यह है कि इसके भीतर कोई दूसरी विजातीय वस्तु नहीं है।
यदीदमेकमद्वैतं परमार्थतः स्वच्छं संसारदुःखासम्पृक्तम्, किन्निमित्तोऽयं खिल्यभाव आत्मनो जातो मृतः सुखी दुःख्यहं ममेत्येवमादिलक्षणोऽनेक संसारधर्मोपद्रुतः ? इत्युच्यते—यदि यह आत्मतत्त्व एक, अद्वैत, परमार्थतः शुद्ध और सांसारिक दुःखोंसे असंस्पृष्ट है तो आत्माका यह खिल्यभाव क्यों है तथा यह मैं उत्पन्न हुआ, मरा, सुखी, दुःखी, अहं, मम इत्यादि लक्षणोंवाले अनेकों सांसारिक धर्मोंसे दूषित क्यों है ? इसपर कहा जाता है—