बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 1283 of 1402
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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| च प्राणस्यानग्नताकरणार्थत्वे च द्विकार्यताचमनस्य स्यात्; न च कार्यद्वयमाचमनस्यैकस्य युक्तम्, यदि प्रायत्यार्थं नानग्नतार्थम्, अथानग्नतार्थं न प्रायत्यार्थम् । यस्मादेवम्, तस्माद् द्वितीयमाचमनान्तरं प्राणस्यानग्नताकरणाय भवतु । | वहाँ यदि प्राण को अनग्न करना (वस्त्र देना) उद्देश्य रहे तो उस आचमनके दो कार्य हो जायंगे; किंतु एक ही आचमनके दो कार्य होने उचित नहीं हैं! यदि वह शुद्धिके लिये होगा तो प्राणकी अनग्नताके लिये नहीं हो सकता और यदि प्राणकी अनग्नताके लिये होगा तो शुद्धिके लिये नहीं हो सकता। चूँकि ऐसा है, इसलिये दूसरा आचमन प्राणकी अनग्नताके लिये हो सकता है। |
| न, क्रियाद्वित्वोपपत्तेः । द्वे ह्येते क्रिये भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं स्मृतिविहितं तत् प्रायत्यार्थं भवति क्रियामात्रमेव न तु तत्र प्रायत्यं दर्शनाद्यपेक्षते । तत्र चाचमनाङ्गभूतास्वप्सु वासोविज्ञानं प्राणस्येतिकर्तव्यतया चोद्यते, न तु तस्मिन् क्रियमाणे आचमनस्य प्रायत्यार्थता बाध्यते, क्रियान्तरत्वादाचमनस्य । तस्माद् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दो क्रियाओंका होना युक्तिसंगत है। ये दोनों ही क्रियाएँ होती हैं, भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो स्मृतिविहित आचमन होता है वह केवल क्रियामात्र और शुद्धिके लिये ही होता है, उसमें शुद्धिको किसी दृष्टि आदिकी अपेक्षा नहीं है। वहाँ आचमनके अङ्गभूत जलमें प्राणके वस्त्रविज्ञानका तो इतिकर्त्तव्यतारूपसे विधान किया जाता है, उसके करनेपर आचमनकी शुद्ध्यर्थताका बाध होता हो—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आचमन तो दूसरी |