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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 1282 of 1402

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Page 1282
१२६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६
संस्कृतहिन्दी
तत्र च प्राणात्मभूतस्य सर्वात्मनोऽनदनीयमप्याद्यमेव; तथाप्रतिग्राह्यमपि प्रतिग्राह्यमेवेति यथाप्राप्तमेवोपादाय विद्या स्तूयते अतो नैव फलविधिसरूपता वाक्यस्य ।अवस्था में प्राणात्मभावको प्राप्त हुए इस सर्वात्माका अभक्ष्य भी भक्ष्य ही है तथा अप्रतिग्राह्य भी प्रतिग्राह्य ही है—इस प्रकार यथाप्राप्त स्थितिको ही लेकर इस उपासनाकी स्तुति की जाती है। अतः इस वाक्यकी फलविधिसरूपता नहीं है।
यस्मादापो वासः प्राणस्य, तस्माद् विद्वांसो ब्राह्मणाःश्रोत्रिया अधीतवेदा अशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणो आचामन्त्योऽशित्वाचामन्ति भुक्त्वा चोत्तरकालमपो भक्षयन्ति । तत्र तेषामाचमतां कोऽभिप्रायः ? इत्याह—एतमेवानं प्राणमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते । अस्ति चैतद् यो यस्मै वासो ददाति स तमनग्नं करोमीति हि मन्यते; प्राणस्य चापो वास इति ह्युक्तम्; यदपः पिबामि तत् प्राणस्य वासो ददामीति विज्ञानं कर्तव्यमित्येवमर्थमेतत् ।क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है, इसलिये श्रोत्रिय--जिन्होंने वेदाध्ययन किया है वे विद्वान् ब्राह्मण जब अशन अर्थात् भोजन करनेको होते हैं तो पहले जलका आचमन करते हैं तथा अशन करके भी आचमन करते हैं अर्थात् भोजन करके उसके पीछे भी जल पीते हैं। वहाँ उनके जलपान करनेका क्या अभिप्राय होता है। सो श्रुति बतलाती है--वे इस प्राणको ही हम अनग्न कर रहे हैं--ऐसा मानते हैं। यह बात प्रसिद्ध है कि जो जिसको वस्त्र देता है, वह 'उसे मैं अनग्न कर रहा हूँ' ऐसा मानता है। प्राणका वस्त्र जल है--यह तो कहा ही जा चुका है। अतः यह उपदेश इसलिये है कि 'मैं जो जल पीता हूँ वह प्राणको वस्त्र देता हूँ'--ऐसी दृष्टि करनी चाहिये।
ननु भोक्ष्यमाणो भुक्तवांश्च प्रयतो भविष्यामीत्याचामति; तत्र-शङ्का-किंतु भोजन करनेवाला तथा भोजन कर चुकनेवाला मनुष्य तो इसलिये आचमन करता है कि मैं आचमन करनेसे पवित्र हो जाऊँगा,