ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ४१ ॥ ९
आकाशः= (वहाँ) 'आकाश' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; अर्थान्तर-
त्वादिव्यपदेशात्=क्योकि उसे नाम-रूपमय जगत्से भिन्न वस्तु बताया गया है।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (८ । १४ । १) मे कहा गया है कि
'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतम् स आत्मा ।'
अर्थात् 'आकाश नामसे प्रसिद्ध तत्त्व नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है, वे
दोनो जिसके भीतर है, वह ब्रह्म है, वह अमृत है और वही आत्मा है।' इस
प्रसङ्गमें 'आकाश'को नामरूपसे भिन्न तथा नामरूपात्मक जगत्को धारण करने-
वाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश अथवा जीवात्माका वाचक नहीं
हो सकता; क्योकि भूताकाश तो स्वयं नामरूपात्मक प्रपञ्चके अन्तर्गत है और
जीवात्मा सबको धारण करनेमे समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित
समस्त जडचेतनात्मक जगत्को अपनेमे धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा
ही यहाँ 'आकाश' नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा-
ये विशेषण दिये गये है, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं है;
इसलिये उनसे भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है।
सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको प्राप्त होता
है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः यहाँ उसीको
आकाश नामसे कहा गया है, ऐसा मान लें तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं-
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १ । ३ । ४२ ॥
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमे भी; भेदेन = (जीवात्मा
और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है; (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ
परमात्माका ही बोधक है)।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१) मे कहा है कि 'जिस अवस्थामे
यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त)
होता है। * यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमे जीवात्माका 'पुरुष' नामसे
और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी
तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है-'यह जीवात्मा इस शरीरसे
- यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ ६ में आ गया है।