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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात
समझाये बिना, इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदके
बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् ‘तु’ शब्दका प्रयोग
करके यह स्पष्ट कर दिया कि ‘वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको
जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।’ इस कथनसे नारदके मनमे सत्य
तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा,
निष्ठा और क्रियाको बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान्
परब्रह्म परमात्माको बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राण-
शब्दवाच्य जीवात्मासे अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस
प्रकरणमे ‘भूमा’ शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका
ही वाचक है। प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं।
सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपि तु—
धर्मोपपत्तेश्च ॥ १ । ३ । ८ ॥
धर्मोपपत्तेः=(उक्त प्रकरणमे) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी ब्रह्ममे
ही सुसंगत हो सकते है—इसलिये; च=भी; (यहाँ ‘भूमा’ ब्रह्म ही है)
व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन किया गया
है—‘यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्
पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् ।
स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि।’ (छा० उ० ७ । २४ । १)
अर्थात् “जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको देखता है, न अन्यको सुनता है, न
अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ अन्यको देखता, सुनता और जानता
है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह नाशवान्
'है। इसपर नारदने पूछा—‘भगवन् ! वह भूमा किसमे प्रतिष्ठित है?’ उत्तरमे
सनत्कुमारने कहा—‘अपनी महिमामे।’ आगे चलकर फिर कहा है कि ‘धन,
सम्पत्ति, मकान आदि जो महिमाके नामसे प्रसिद्ध है, ऐसी महिमामे वह भूमा
प्रतिष्ठित नहीं है; किन्तु वही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाये और बाये है;
तथा वही यह सब कुछ है।’ इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे
कहा है और यह भी बताया है कि ‘आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे,
दाये और बाये है तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा