Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 72 of 417

Read in context
Page 72

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ५१
है। फिर अन्तमें प्राणको इन सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना
करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है।
इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें सबसे बड़ा प्राण है और उसीको
'भूमा' एवं आत्मा भी कहते हैं; तब तो पूर्व प्रकरणमे भी सबका आधार
प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये; इसका समाधान करनेके लिये
आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है--
भूमा संप्रसादादध्युपदेशात् ॥ १ । ३ । ८ ॥
भूमा = ( उक्त प्रकरणमे कहा हुआ ) 'भूमा' ( सबसे बडा ) ब्रह्म ही
है; संप्रसादात् = क्योकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा);
उपदेशात् = बताया गया है ।
व्याख्या-उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको
बड़ा बताते हुए पंद्रहवे खण्डमे प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा
वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्व समर्पितम् । प्राणः प्राणेन
याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति । प्राणो ह पिता प्राणो माता
प्राणो भ्राता प्राण. स्वसा प्राण आचार्य. प्राणो ब्राह्मण ।' ( छा० उ० ७ ।
१५ । १ ) अर्थात् 'जैसे अरे. रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते है, उसी प्रकार
समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण
ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण
भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे
यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है, क्योंकि
सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'संप्रसाद' रक्खा है और संप्रसाद
नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) मे
स्पष्ट कही गयी है । इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमे आगे चलकर यह
भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है, इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला,
देखनेवाला और जाननेवाल' है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह
धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमे प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही
सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुन.
अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया । मानो उन्हे अपने प्रश्नका पूरा उत्तर