ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २२-२४ ] अध्याय १ ३९
प्रकृति दोनोंमेंसे कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं
हो सकता ।
सम्बन्ध-इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है,
वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित
करते हैं—
रूपोपन्यासाच्च ॥ १ । २ । २३ ॥
रूपोपन्यासात् = श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् स्वरूपका वर्णन किया
गया है, इससे; च = भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय
विराट्स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है—
'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥'
'अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा ओर सूर्य दोनों नेत्र है, सब
दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण
और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है । यही समस्त
प्राणियोंका अन्तरात्मा है।' इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके
उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है; इसलिये उक्त प्रकरणमे 'भूतयोनि'के नामसे
परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५ । १८ । २)
में 'वैश्वानर'के स्वरूपका वर्णन करते हुए 'द्युलोक'को उसका मस्तक बताया है ।
'वैश्वानर' शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः यह वर्णन जठरानलके विषयमें
है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण
आरम्भ किया जाता है—
वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥
वैश्वानरः = ( वहाँ ) 'वैश्वानर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है;
साधारणशब्दविशेषात् = क्योकि उस वर्णनमे 'वैश्वानर' और 'आत्मा' इन
साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है ।