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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३
प्रकार उपासना करनी चाहिये । अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना
चाहिये; क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है । इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे
युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः
उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।' इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना
करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है ।
अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।
सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा० उ० (३।१४।२) में उपास्यदेवको
मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है । ये विशेषण जीवात्माके हैं;
अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर
कहते हैं—
विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥
च=तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः=श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस
परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये (इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है) ।
व्याख्या-छा० उ० (३।१४।२) मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध
होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा
सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ।' अर्थात् 'वह
उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके
सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त
जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा संभ्रमशून्य है।' इस
वर्णनमे उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सङ्गत
होते है । ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं
है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है । केनोपनिषद्मे उसको मनका भी
मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया. हुआ
उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (सङ्गति) ब्रह्ममें

  • श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाच५ स उ प्राणस्य प्राणः ।
    (के० उ० १।२)