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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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दूसरा पाद
प्रथम पादमे यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति'
तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्मे जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका
वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण'शब्दका प्रसङ्ग
आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।२) मे आये हुए 'मनोमयः प्राण-
शरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके
चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं।
इस पादमे यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१)
में पहले तो सम्पूर्ण जगत्‌को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये
कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्व-
कर्मा' आदि विशेषण दिये गये है (३।१४।२), जो कि जीवात्माके
प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसीको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्'
अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा
है (३।१४। ३-४)। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव
कौन है ? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही ? इसका निर्णय करनेके
लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १।२।१॥
सर्वत्र = सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमे; प्रसिद्धोपदेशात् = (जगत्‌की उत्पत्ति,
स्थिति और लयके कारणरूपने ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें
उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३।१४ में बताया हुआ उपास्यदेव
ब्रह्म ही है)।
व्याख्या = छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें
सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति ,
स क्रतुं कुर्वीत ।' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि
यह उसीसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें
उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस