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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 392

चौथा पाद
तीसरे पादमें अर्चि आदि मार्गद्वारा परब्रह्म और कार्यब्रह्मके
लोकमें जानेवालोंकी गतिके विषयमें निर्णय किया गया। अब उपासकोंके
संकल्पानुसार ब्रह्मलोकमें पहुँचनेके बाद जो उनकी स्थितिका भेद होता है,
उसका निर्णय करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले
उन साधकोंके विषयमें निर्णय करते हैं, जिनका उद्देश्य परब्रह्मकी प्राप्ति है और
जो उस परब्रह्मके अप्राकृत दिव्य परमधाममें जाते हैं—
सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४ । ४ । १ ॥
सम्पद्य=परमधामको प्राप्त होकर (इस जीवका); स्वेन=अपने
वास्तविक स्वरूपसे; आविर्भावः=प्राकट्य होता है; शब्दात्=क्योंकि श्रुतिमें
ऐसा ही कहा गया है।
व्याख्या—'जो यह उपासक इस शरीरसे ऊपर उठकर परम ज्ञानस्वरूप
परमधामको प्राप्त हो (वहाँ) अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।
यह आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा—यह (उसको प्राप्त होनेवाला)
अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। निस्सन्देह उस इस (प्राप्तव्य) परब्रह्मका
नाम सत्य है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४)—इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता
है कि परमधामको प्राप्त होते ही वह साधक अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न
हो जाता है अर्थात् प्राकृत सूक्ष्म शरीरसे रहित, श्रुतिमे बताये हुए पुण्य-पापशून्य,
जरा-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, सत्यकाम, सत्य-संकल्प, शुद्ध एवं अजर-
अमररूपसे युक्त हो जाता है। (छा० उ० ८ । १ । ५) इस प्रकरणमें जो
संकल्पसे ही पितर आदिकी उपस्थिति होनेका वर्णन है, वह ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका
सूचक है। उसका भाव यह है कि जीवनकालमें ही हृदयाकाशके भीतर संकल्पसे
पितृलोक आदिके सुखका अनुभव होता है, न कि ब्रह्मलोकमें जानेके बाद;
क्योंकि उस प्रकरणके वर्णनमें यह बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका
संकल्पसे उपस्थित होना कहा है (छा० उ० ८ । २ । १ से १०)। इसके
बाद, उसके लिये प्रतिदिन यहाँ हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही
है (छा० उ० ८ । ३ । ३)। तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी