ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 391 of 417
Read in context३७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा
देते हैं; परन्तु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस
नहीं लौटते ।
सम्बन्ध-प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिर्मार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण
है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
विशेषं च दर्शयति ॥ ४ । ३ । १६ ॥
विशेषम् = इसका विशेष कारण; च = भी; दर्शयति = श्रुति दिखाती है ।
व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी क्यो
नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका
वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल
जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया
गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाका अलग-
अलग फल बताया है, सबके फलमे एकता नहीं है । इसलिये वे उपासक
देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमे जानेके अधिकारी है और न परब्रह्म
परमेश्वरके परमधाममे ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी
देवताओका अर्चिर्मार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है ।
तीसरा पाद सम्पूर्ण ।