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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 379

३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे
सम्बद्ध एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके
द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है, शरीरसे जाते
समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोमे ले जानेवाली होती हैं*
(छा० उ० ८। ६। ६)। इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरण-
कालमे वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके
मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके
फलरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद्
परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोमे चला जाता है।
सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं--
रश्म्यनुसारी ॥ ४ । २ । १८ ॥
रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोमे स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह
सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)।
व्याख्या-'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी
रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमे मन जाता
है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोके लिये
ब्रह्मलोकमे जानेका द्वार है, यह अविद्वानोके लिये बंद रहता है, इसलिये वे
नीचेके लोकोंमे जाते हैं।'† (छा० उ० ८। ६। ५)। इस श्रुतिके कथनसे
यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता
सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे
चला जाता है; उसमे उसको विलम्ब नहीं होता।
सम्बन्ध-रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि किसी
ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-
निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा-
दर्शयति च ॥ ४ । २ । १९ ॥

  • यह मन्त्र सूत्र ४। २ । ९ की व्याख्यामे अर्थसहित आ गया है।
    † 'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति
    वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं
    विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्।'