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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 378

सूत्र १६-१७ ] अध्याय ४ ३५७
सम्बन्ध-ब्रह्मलोकमे जानेवालोंकी गतिका प्रकार बतानेके उद्देश्यसे प्रकरण
आरम्भ करके सातवें सूत्रमे यह सिद्ध किया गया कि मृत्युकालमे प्राण, मन और
इन्द्रियोंके सहित जीवात्मा स्थूल शरीरसे निकलते समय सूक्ष्म पाँच भूतोंके
समुदायरूप सूक्ष्म शरीरमें स्थित होता है। यहाँतक तो साधारण मनुष्यके
समान ही विद्वान्की भी गति हे। उसके बाद आठवें सूत्रमे यह निर्णय किया गया
कि साधारण मनुष्य तो सबके कारणरूप परमेश्वरमें प्रलयकालकी भाँति
स्थित होकर परमात्माके-विधानानुसार कर्मफलभोगके लिये दूसरे शरीरमें
चले जाते हैं, किन्तु ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मलोकमे जाता है। फिर प्रसङ्गवश नवेंसे
ग्यारहवें सूत्रतक सूक्ष्म शरीरकी सिद्धि की गयी और बारहवेंसे सोलहवेंतक, जिन
महापुरुषोंको जीवनकालमे ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है, वे ब्रह्मलोकमें न
जाकर यहीं ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं यह निर्णय किया गया; अब इस सत्रहवें
सूत्रसे पुनः ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्की गतिके विषयमे विचार आरम्भ
करते हैं। सूक्ष्म शरीरमे स्थित होनेके अनन्तर वह विद्वान् किस प्रकार ब्रह्म-
लोकमें जाता है, यह बतानेके लिये अगला प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है -
तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्यनु-
स्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥ ४ । २ । १७॥
( स्थूल शरीरसे निकलते समय ) तदोकोऽग्रज्वलनम् = उस जीवात्माका
निवासस्थान जो हृदय है, उसके अग्रभागमे प्रकाश हो जाता है; तत्प्रकाशित-
द्वारः=उस प्रकाशमे जिसके निकलनेका द्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह
विद्वान्; विद्यासामर्थ्यात्=ब्रह्मविद्याके प्रभावसे; च=तथा; तच्छेषगत्यनुस्मृति-
योगात् = उस विद्याका शेष अङ्ग जो ब्रह्मलोकमे गमन है, उस गमनविषयक
संस्कारकी स्मृतिके योगसे; हार्दानुगृहीतः = हृदयस्थ परमेश्वरकी कृपासे अनुगृहीत
हुआ; शताधिकया=एक-सौ नाडियोसे अधिक जो एक ( सुषुम्ना ) नाडी है,
उसके द्वारा ( ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता है ) ।
व्याख्या-श्रुतिमे मरणासन्न मनुष्यके समस्त इन्द्रिय, प्राण तथा अन्त करणके
लिङ्गशरीरमें एक हो जानेकी बात कहकर हृदयके अग्रभागमे प्रकाश होनेका
कथन आया है* ( बृह० उ० ४ । ४ । २ ) तथा साधारण मनुष्य और
ॐ 'तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति ।'
'इसके उस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा
निकलता है।'