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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र २२—२४ ] अध्याय १ १५
सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ० १ । ११ । ५) में
आकाशकी ही भाँति प्राणको भी जगत्‌का कारण बतलाया गया है; वहाँ 'प्राण'
शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते हैं—
अत एव प्राणः ॥ १ । १ । २३ ॥
अत एव = इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस
कारण वहाँ; प्राणः = प्राण (भी ब्रह्म ही है) ।
व्याख्या-छान्दोग्य (१ । ११ । ५) में कहा है कि 'सर्वाणि ह वा
इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते ।' अर्थात् 'निश्चय ही ये
सब भूत प्राणमें ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं।'-ये लक्षण
प्राणवायुमे नहीं घट सकते; क्योकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय-
का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अतः यहाँ 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन
हुआ है, ऐसा मानना चाहिये ।
सम्बन्ध-पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको
ब्रह्मका वाचक मानना उचित है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (३ । १३ । ७)
में जिस ज्योति (तेज) को समस्त विश्वसे ऊपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित
बताया हे तथा जिसकी शरीरान्तर्वर्ती पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायी
गयी हे, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया हे, जिससे उसको
ब्रह्मका वाचक माना जाय । इसलिये यह जिज्ञासा होती हे कि उक्त 'ज्योतिः'
शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं—
ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १ । १ । २४ ॥
चरणाभिधानात् = (उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने-
से; ज्योतिः = 'ज्योतिः' शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है ।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे 'ज्योति.' का वर्णन इस प्रकार
हुआ है—'अथ यदत. परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे-
षूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्त. पुरुषे ज्योति. ।' (३ । १३ । ७) अर्थात् 'जो
इस स्वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर
(सबके ऊपर ), जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम 'परमधाममे