ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २६-२७ ] अध्याय ३ ३१७
'यज्ञ, दान और तप ये कर्म त्याज्य नहीं है। इनका अनुष्ठान तो करना
ही चाहिये; क्योकि यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोको पवित्र करनेवाले
है। अर्जुन ! इनका तथा अन्य सब कर्मोंका भी अनुष्ठान फल और आसक्तिको
त्यागकर ही करना चाहिये। यही मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।'
जिसका जैसा अधिकार है, उसीके अनुसार शास्त्रोमे वर्ण और आश्रम-
सम्बन्धी कर्म बताये गये है। अतः यह समझना चाहिये कि सभी कर्म सब
साधकोके लिये उपादेय नहीं होने, किन्तु श्रुतिमे बतलाये हुए ब्रह्मप्राप्तिके साधनोमेसे
जिस साधनको लेकर जो साधक अग्रसर हो रहा है, उसे अपने वर्ण, आश्रम
और योग्यतानुसार अन्य शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान भी निष्कामभावसे करते
रहना चाहिये। इसी उद्देश्यसे श्रुतिमे विकल्प दिखलाया गया है कि कोई तो
गृहस्थमे रहकर यज्ञ, दान और तपके द्वारा उसे प्राप्त करना चाहता है, कोई
संन्यास-आश्रममे रहकर उसे जानना चाहता है, कोई ब्रह्मचर्यके पालनद्वारा
उसे पाना चाहता है और कोई ( वानप्रस्थमे रहकर ) केवल तपस्यासे ही
उसे पानेकी इच्छा रखता है, इत्यादि । इस प्रकार ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये
कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं; परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमे उनकी अपेक्षा नहीं है,
ब्रह्मविद्यासे ही उस फलकी सिद्धि होती है। इसके लिये सूत्रकारने अश्वका
दृष्टान्त दिया है। जैसे योग्यतानुसार घोडा सवारीके काममे लिया जाता है, प्रासादपर
चढनेके कार्यमें नहीं, उसी प्रकार कर्म ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमे सहायक है, ब्रह्मके
साक्षात्कारमें नहीं।
सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या ऐसे विशेष साधन भी हैं, जो
सभी वर्ण, आश्रम और योग्यतावाले साधकोंके लिये समानभावसे आवश्यक हों ?
इस जिज्ञासापर कहते हैं --
शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदङ्गतया
तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥
तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी ( साधकको ); शमदमा-
द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि;
तदङ्गतया = उस ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान
होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है।
व्याख्या—श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि
'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढती है और न घटती है।