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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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३१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।'
इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमे सर्वथा स्वतन्त्र होनेके
कारण कर्मकी अङ्गभूत नहीं हो सकती।
सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी
यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नही है, क्या इसमें
किसी भी कर्मकी आवश्यकता नही है ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला
प्रकरण आरम्भ किया जाता है-
सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३ । ४ । २६ ॥
च=इसके सिवा; सर्वापेक्षा=विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णाश्रमोचित
कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामे हेतु
बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममे ही लिया
जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमे नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके
लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं।
व्याख्या-'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोका स्वामी है' इत्यादि
वचनोसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमे कहा है कि 'इस परमेश्वरको
ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा
जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस
संन्यासियोके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते है।'
इत्यादि (बृह० उ० ४ । ४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमे भी कहा है कि 'जिस
परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते है, समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते
है अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन है तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका
पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमे कहता हूँ' (क० उ० १ । २ । १५)
इत्यादि । श्रुतिके इन वचनोसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके
लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी
गीता ( १८ । ५-६) में कहा है-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानिति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥