ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 218 of 417
Read in contextचौथा पाद
इसके पूर्व तीसरे पादमें पाँच भूतों तथा अन्तःकरणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन
किया गया और गौणरूपसे जीवात्माकी उत्पत्ति भी बतायी गयी। साथ ही
प्रसंगवश जीवात्माके स्वरूपका भी विवेचन किया गया। किन्तु वहाँ इन्द्रियों और
प्राणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन नहीं हुआ, इसलिये उनकी उत्पत्तिका विचारपूर्वक
प्रतिपादन करनेके लिये तथा तद्विषयक श्रुतियोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका
निराकरण करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है।
श्रुतिमें कहीं तो प्राण और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें परमेश्वरसे
बतायी है (मु० उ० २।१।३; प्र० उ० ६।४), कहीं अग्नि, जल और
पृथिवीसे उनका उत्पन्न होना बताया गया है (छा० उ० ६।६।२ से ५) तथा
कहीं आकाश आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन है, वहाँ इन प्राण और
इन्द्रिय आदिका नामतक नहीं आया है (तै० उ० २।१) और कहीं तत्त्वोंकी उत्पत्तिके
पहले ही इनका होना माना है (शतपथब्रा० ६।१।१।१) उससे इनकी
उत्पत्तिका निषेध प्रतीत होता है। इसलिये श्रुतिवाक्योंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका
निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं—
तथा प्राणाः ॥ २ । ४ । १ ॥
तथा = उसी प्रकार; प्राणाः = प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियाँ भी (परमेश्वरसे ही
उत्पन्न होती हैं)।
व्याख्या—जिस प्रकार आकाशादि पाँचो तत्त्व तथा अन्य सब परब्रह्म
परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ भी उसी परमेश्वरसे
उत्पन्न होती हैं; क्योंकि उन आकाश आदिकी और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमे किसी
प्रकारका भेद नहीं है। श्रुति स्पष्ट कहती है कि 'इस परब्रह्म परमेश्वर-
से ही प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको
धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।' *(मु० उ० २।१।३) इस प्रकार
इन्द्रियोकी उत्पत्तिका श्रुतिमे वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ भी उस
परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं।
- यह मन्त्र पहले पृष्ठ १६९ मे आ गया है।