ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
व्याख्या—ईश्वर तथा जीवोंका अंशांशिभाव वास्तविक नहीं, घटाकाशकी भाँति
उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होनेवाला है, यह माननेपर जिस प्रकार पूर्वसूत्रमें
जीवोंके कर्मफल-भोगकी नियमित व्यवस्था न हो सकनेका दोष दिखाया गया
है, उसी प्रकार उन जीवोंके सङ्कल्प और इच्छा आदिके विभागकी नियमित
व्यवस्था होनेमें भी बाधा पड़ेगी; क्योंकि उन सबके सङ्कल्प आदि परस्पर अलग
नहीं रह सकेंगे और परमात्माके सङ्कल्प आदिसे भी उनका भेद सिद्ध नहीं हो
सकेगा। अतः शास्त्रमें जो परब्रह्म परमेश्वरके द्वारा ईक्षण ( सङ्कल्प ) पूर्वक
जगत्की उत्पत्ति करनेका वर्णन है, उसकी भी सङ्गति नहीं बैठेगी।
प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ २ । ३ । ५३ ॥
चेत्=यदि कहो; प्रदेशात्=उपाधियोंमें देशभेद होनेसे ( सब व्यवस्था हो
जायगी ); इति न=तो यह नहीं हो सकता; अन्तर्भावात्=क्योंकि सभी
देशोंका उपाधिमें और उपाधियोंका उस परमेश्वरमें अन्तर्भाव है।
व्याख्या—यदि कहो, उपाधियोंमें देशका भेद होनेसे सब जीवोंका अलग-
अलग विभाग हो जायगा और उसीसे कर्मफल-भोग एवं सङ्कल्प आदिकी भी
व्यवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वर
सभी उपाधियोंमें व्याप्त है। उपाधियोंके देशभेदसे परमात्माके देशमें भेद नहीं
हो सकता। प्रत्येक उपाधिका सम्बन्ध सब देशोंसे हो सकता है। उपाधि एक
जगहसे दूसरी जगह जाय तो उसके साथ विभुतत्त्व नहीं आता-जाता है। जब
जिस देशमें उपाधि रहती है, उस समय वहाँका विभुतत्त्व उसमें आ जाता है।
इस प्रकार समस्त विभुतत्त्वके प्रदेशका सब उपाधियोंमें अन्तर्भाव होगा। इसी
तरह समस्त उपाधियोंका भी विभुतत्त्वमें अन्तर्भाव होगा। किसी प्रकारसे कोई
विभाग सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसलिये परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्माओका
अंशांशिभाव घटाकाशकी भाँति उपाधिनिमित्तक नहीं माना जा सकता।
तीसरा पाद सम्पूर्ण।