ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ३७—४० ] अध्याय २ १८५
शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी जीवात्मा अपने हितका आचरण करनेमे सर्वथा
स्वतन्त्र नहीं है ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्माका कर्तापन उसमें
स्वरूपसे ही मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—
समाध्यभावाच्च ॥ २ । ३ । ३९ ॥
समाध्यभावात् = समाधि-अवस्थाका अभाव प्राप्त होनेसे; च = भी
( जीवात्माका कर्तापन स्वाभाविक नहीं मानना चाहिये ) ।
व्याख्या—समाधि-अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। यदि
जीवमें कर्तापन उसका स्वाभाविक धर्म मान लिया जायगा तो समाधि-अवस्थाका
होना सिद्ध नहीं होगा; क्योंकि जिस प्रकार जीवात्मामें चेतनता स्वरूपगत धर्म
है, उसी प्रकार यदि कर्म भी हो तो वह कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता;
किन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है; जीवात्माका स्वरूप निष्क्रिय माना गया है,
( श्वेता० ६ । १२ ) अतः उसमे जो कर्तापन है, वह अनादिसिद्ध अन्तःकरण
आदिके सम्बन्धसे है, स्वरूपगत नहीं है ।
सम्बन्ध—इस बातको दृढ़ करनेके लिये फिर कहा जाता है—
यथा च तक्षोभयथा ॥ २ । ३ । ४० ॥
च=इसके सिवा; यथा=जैसे; तक्षा=कारीगर; उभयथा=कभी कर्म करता
है, कभी नहीं करता, ऐसे दो प्रकारकी स्थितिमें देखा जाता है ( उसी प्रकार जीवात्मा
भी दोनों प्रकारकी स्थितिमें रहता है, इसलिये उसका कर्तापन स्वरूपगत नहीं है ) ।
व्याख्या—जिस प्रकार रथ आदि वस्तुओंको बनानेवाला कारीगर जब अपने
सहकारी नाना प्रकारके हथियारोंसे सम्पन्न होकर कार्यमें प्रवृत्त होता है, तब तो
वह उस कार्यका कर्ता है और जब हथियारोंको अलग रखकर चुपचाप बैठ
जाता है, तब उस क्रियाका कर्ता नहीं है । इस प्रकार यह जीवात्मा भी जब
अन्तःकरण और इन्द्रियोंका अधिष्ठाता होता है, तब तो उनके द्वारा किये
जानेवाले कर्मोंका वह कर्ता है और जब उनसे सम्बन्ध छोड़ देता है, तब कर्ता
नहीं है । अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है । इसके सिवा, यदि
जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीतादिका निम्नलिखित
वर्णन सर्वथा असङ्गत ठहरेगा—