ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है ?
इसपर कहते हैं—
उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥
उपलब्धिवत्=सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः=कर्म
करनेमें भी नियम नहीं है ।
व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती
है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही-अनुकूल भोग प्राप्त हो,
प्रतिकूल न हो; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने
हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे । यदि कहो कि फलभोगमें तो जीव
प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे
भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परन्तु नये कर्मोंके करनेमें
तो वह स्वतन्त्र है, फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका
उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये
कर्म करनेमें अनादिकालसे सञ्चित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ
है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं
हो सकता । अतः कोई विरोध नहीं है । भगवान्का आश्रय लेकर यदि यह अपने
स्वभावको सुधारनेमें लग जाय तो उसका सुधार कर सकता है । उसका पूर्णतया
सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है ।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं—
शक्तिविपर्ययात् ॥ २ । ३ । ३८ ॥
शक्तिविपर्ययात्=शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी ( उसके द्वारा सर्वथा
हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता ) ।
व्याख्या—जीवात्माका जो कर्त्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किन्तु अनादि
कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं।
इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम
करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है; उन सबकी
उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है। एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति
भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है । इस प्रकार