ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र १५ ] अध्याय २ १६९
का वर्णन करते हुए उसे अजन्मा, अविनाशी, दिव्य, निराकार, सब प्रकारसे
परम शुद्ध और समस्त जगत्के बाहर-भीतर व्याप्त बताया गया है । *
तदनन्तर यह कहा गया है कि 'इसी परब्रह्म पुरुषोत्तमसे यह प्राण, मन,
सब इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण करनेवाली
पृथिवी उत्पन्न होती है ।' † इस वर्णनसे परमात्मासे पहले प्राण, मन और
इन्द्रियोंके उत्पन्न होनेकी बात बताकर आकाश आदि भूतोंकी क्रमशः
उत्पत्ति बतायी गयी है; अतः परमात्मा और आकाशके बीचमें मन इन्द्रियोंका
स्थान निश्चित होता है । तात्पर्य यह कि प्राण और इन्द्रियोसहित मनकी उत्पत्ति-
के बाद ही आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि माननी चाहिये; क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिमे
जैसा क्रम दिया गया है, वह इसी निश्चयपर पहुँचानेवाला है; ऐसा यदि कोई
कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि इस वर्णनमें विशेषरूपसे
कोई क्रम नहीं बताया गया है । इससे तो केवल यही बात सिद्ध होती
है कि बुद्धि, मन और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी परमेश्वरसे ही होती है;
इतना ही क्यों, उक्त श्रुतिके पूरे प्रकरणको देखनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि
श्रुतिका उद्देश्य किसी प्रकारके क्रमका प्रतिपादन करना नहीं है, उसे केवल यही
बताना अभीष्ट है कि जगत्का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म है;
क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्पोंमे भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन श्रुतियो और
स्मृतियोंमें पाया जाता है । अतः किसी एक ही क्रमको निश्चित कर देना नहीं
बन सकता ( देखिये मु० उ० २ । १ । ५ से ९ तक ) ।
सम्बन्ध—इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड-चेतनात्मक
सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया । इससे यह प्रतीत
होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है ।
यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे
जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी
उत्पत्ति कैसे होती है ? इसपर कहते हैं—
- दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥
( मु० उ० २ । १ । २ )
† एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
( मु० उ० २ । १ । ३ )