ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलय-
काल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वों-
का अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमे, जल अग्निमें, अग्नि वायु-
में, वायु आकाशमें और आकाश परमात्मामें विलीन हो जाता है। युक्तिसे भी
यही क्रम ठीक जान पड़ता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारणमें ही लीन
होता है। जैसे जलसे बर्फ बनता है और जलमें ही उसका लय होता है।
स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन आता है। (देखिये विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४,
श्लोक १४ से ३८ तक)।
सम्बन्ध—यहाँ भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम तो बताया गया, परन्तु
मन, बुद्धि और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिके विषयमें कोई निर्णय नहीं हुआ; अतः यह
जिज्ञासा होती है कि इन सबकी उत्पत्ति भूतोंसे होती है या परमेश्वरसे ? यदि
परमेश्वरसे होती है तो भूतोंके पहले होती है या पीछे ? अतः इसका निर्णय
करनेके लिये कहते हैं—
अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति
चेन्नाविशेषात् ॥ २ । ३ । १५ ॥
चेत्=यदि कहो; विज्ञानमनसी=इन्द्रियाँ और मन; क्रमेण=उत्पत्ति-क्रम-
की दृष्टिसे; अन्तरा ( स्याताम् )=परमात्मा और आकाश आदि भूतोंके बीचमें
होने चाहिये; तल्लिङ्गात्=क्योंकि ( श्रुतिमे ) यही निश्चय करानेवाला लिङ्ग
(प्रमाण) प्राप्त होता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अवि-
शेषात्=क्योंकि श्रुतिमें किसी क्रम-विशेषका वर्णन नहीं है।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले यह वर्णन आया है कि 'जैसे प्रज्वलित
अग्निसे चिनगारियोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार ये नाना नाम-रूपोंसे संयुक्त
पदार्थ उस परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमे विलीन हो जाते हैं।'*
(मु० २ । १ । १) फिर जगत्के कारणरूप उस परमेश्वरके परात्पर स्वरूप-
- यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥ (मु० उ० २ । १ । १)