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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 145

१२४ वेदान्त-दर्शन [पाद १
व्याख्या-ब्रह्मका इस विचित्र जगत्‌की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं
है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्‌की रचना करना
आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही
होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी
बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्‌का कर्ता नहीं
है; क्योंकि जगत्‌मे प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य
आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता।
अतः परब्रह्मको जगत्‌का कर्ता नहीं मानना चाहिये।
सम्बन्ध-पूर्वोक्त शङ्काका उत्तर देते हैं—
लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥ २। १ । ३३ ॥
तु=किन्तु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो);
लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है।
व्याख्या-जैसे लोकमे देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं,
जिनका जगत्‌से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे
जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महा-
पुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्‌का हित साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः
किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमे समर्थ न होनेके
कारण केवल लीलामात्र ही है। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका
भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण
करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन
नहीं है तथा उन कर्मोंमे कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है;
इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वर-
के कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी
दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है, तथापि परमेश्वरकी
यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर
सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना
प्रयोजन इस जगत्‌की रचना आदि कार्य होना उचित ही है। *

  • भगवान् केवल सङ्कल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी