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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र २९—३२ ] अध्याय २ १२३
तथा उस परब्रह्मके शासनमे सूर्य-चन्द्रमा आदिको दृढ़तापूर्वक स्थित
बताया जाना, (बृ० उ० ३ । ८ । ९) उसमे ज्ञान, बल और क्रियारूप
नाना प्रकारकी स्वाभाविक शक्तियोका होना, (श्वेता० ६ । ८) जगत्के कारण-
का अनुसन्धान करनेवाले महर्षियोंद्वारा उस परमात्मदेवकी आत्मभूता शक्तिका
दर्शन करना (श्वेता० १ । ३) इत्यादि प्रकारसे परब्रह्मकी शक्तियोको सूचित
करनेवाले बहुत-से वचन वेदमे मिलते हैं, जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका
है। इस तरह अनेक विचित्र शक्तियोसे सम्पन्न होनेके कारण उस परब्रह्म
परमात्मासे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना अयुक्त नहीं है। श्रुतिमे जो ब्रह्मको
अवयवरहित बताया गया है, वह उसके स्वरूपकी अखण्डता बतलानेके उद्देश्य-
से है, उसकी शक्तिरूप अंशोके निषेधमे उसका अभिप्राय नहीं है; इसलिये
परमात्मा ही इस जगत्का कारण है, यही मानना ठीक है।
सम्बन्ध—पुनः शङ्का उठाकर उसका निराकरण करते हैं—
विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम् ॥ २ । १ । ३१ ॥
( श्रुतिमे उस परमात्माको ) विकरणत्वात्=मन और इन्द्रिय आदि
करणोंसे रहित बताया गया है, इसलिये, न=( वह ) जगत्का कारण नहीं है;
चेत्=यदि; इति=ऐसा कहो; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है।
व्याख्या—यदि कहो, 'ब्रह्मको शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे
रहित कहा गया है; (श्वेता० ६ । ८) इसलिये वह जगत्का बनानेवाला
नहीं हो सकता' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इसका उत्तर पहले 'सर्वोपेता
च तद्दर्शनात्' ( २ । १ । ३० ) इस सूत्रमे परब्रह्मको सर्वशक्तिसम्पन्न बताकर
दे दिया गया है। तथा श्रुतिने भी स्पष्ट शब्दोमे यह कहा है कि वह परमेश्वर
हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियोसे रहित होकर भी सबका कार्य करनेमे समर्थ
है (श्वेता० ३ । १९)। इसलिये ब्रह्म ही जगत्का कारण है, ऐसा माननेमें
कोई आपत्ति नहीं है।
सम्बन्ध—अब पुनः दूसरे प्रकारकी शङ्का उपस्थित करते हैं—
न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ २ । १ । ३२ ॥
न=परमात्मा जगत्का कारण नहीं हो सकता; प्रयोजनवत्त्वात्=क्योकि
प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रयोजनसे युक्त होता है ( और परमात्मा पूर्णकाम
होनेके कारण प्रयोजनरहित है )।