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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 134

सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ ११३
व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे कहा है कि 'असद् वा इदमग्र आसीत् । ततो
वै सदजायत । तदात्मानꣳ स्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते ।' (तै० उ० २ । ७)
अर्थात् 'यह सब पहले 'असत्' ही था, उसीसे सत् उत्पन्न हुआ; उसने स्वयं
ही अपनेको इस रूपमें बनाया, इसलिये उसे 'सुकृत' कहते हैं।' इस श्रुतिमे
जो यह बात कही गयी है कि 'पहले असत् ही था' उसका अभिप्राय यह नहीं
है कि यह जगत् प्रकट होनेके पहले नहीं था, क्योकि इसके बाद 'आसीत्' पदसे
उसका होना कहा है। फिर उससे सत्‌की उत्पत्ति बतलायी है। तत्पश्चात् यह
कहा है कि उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमे प्रकट किया है। अतः यहाँ यह
समझना चाहिये कि धर्मान्तरकी अपेक्षासे उसको 'असत्' कहा है। अर्थात्
प्रकट होनेसे पहले जो अप्रकट रूपमे विद्यमान रहना धर्मान्तर है, इसीको 'असत्'
नामसे कहा गया है, उसकी अविद्यमानता बतानेके लिये नहीं। तात्पर्य यह कि
उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् असत्—अप्रकट था। फिर उससे सत्की उत्पत्ति हुई—
अर्थात् अप्रकट जगत् अपने अप्राकट्यरूप धर्मको त्यागकर प्राकट्यरूप धर्मसे
युक्त हुआ—अप्रकटसे प्रकट हो गया। छान्दोग्योपनिषद्मे इस बातको स्पष्ट
रूपसे समझाया है। वहाँ श्रुतिका वर्णन इस प्रकार है—'तद्वैक आहुरसदेवेदमग्र
आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ।' (६।२।१) अर्थात् 'कोई-
कोई कहते हैं, यह जगत् पहले 'असत्' ही था, अकेला वही था, दूसरा कोई
नहीं, फिर उस 'असत्' से 'सत्' उत्पन्न हुआ।' इतना कहकर श्रुति स्वयं ही
अभावके भ्रमका निवारण करती हुई कहती है—'कुतस्तु खलु सोम्यैवꣳ
स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति ।' (६।२।२) 'किन्तु हे सोम्य !
ऐसा होना कैसे संभव है, असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है।' तात्पर्य
यह है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिये 'सत्त्वेव
सोम्येदमग्र आसीत् ।' (६।२।२) 'यह सब पहले सत् ही था' यह
श्रुतिने निश्चय किया है। इस प्रकार वाक्यशेषसे सत्कार्यवादकी ही सिद्धि होती है।
सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ करते है—
युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ २ । १ । १८ ॥
युक्तेः=युक्तिसे; च=तथा; शब्दान्तरात्=दूसरे शब्दोसे भी ( यही बात
सिद्ध होती है ) ।
वे० द० ८—