ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
भावे=(कारणमे शक्तिरूपसे) कार्यकी सत्ता होनेपर; च=ही; उपलब्धेः=
उसकी उपलब्धि होती है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि (यह जगत् अपने
कारण-ब्रह्ममें शक्तिरूपसे सदैव स्थित है)।
व्याख्या-यह बात दृढ़ करते हैं कि कार्य अपने कारणमे शक्तिरूपसे
सदैव विद्यमान रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है; क्योंकि जो वस्तु वास्तव-
में विद्यमान होती है, उसीकी उपलब्धि हुआ करती है। जो वस्तु नहीं होती
अर्थात् खरगोशके सींग और आकाशके पुष्पकी भाँति जिसका सर्वथा अभाव होता
है, उसकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसलिये यह जड-चेतनात्मक जगत् अपने
कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमे शक्तिरूपसे अवश्य विद्यमान है, और सदैव अपने
कारणसे अभिन्न है।
सम्बन्ध-सत्कार्यवादकी सिद्धिके लिये ही पुनः कहते हैं-
सत्त्वाच्चावरस्य ॥ २ । १ । १६ ॥
अवरस्य=कार्यका; सत्त्वात्=सत् होना श्रुतिमे कहा गया है, इससे; च=भी;
(प्रकट होनेके पहले उसका होना सिद्ध होता है)।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (६। २। १) में कहा गया है कि 'सदेव
सोम्येदमग्र आसीत्- 'हे सोम्य ! यह प्रकट होनेसे पहले भी सत्य था।'
बृहदारण्यकमें भी कहा है 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् (१।४।७) 'उस
समय यह अप्रकट था।' इन वर्णनोंसे यह सिद्ध है कि स्थूलरूपमे प्रकट होनेके
पहले यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारणमे शक्तिरूपसे विद्यमान रहता है और वही
सृष्टिकालमे प्रकट होता है।
सम्बन्ध-श्रुतिमे विरोध प्रतीत होनेपर उसका निराकरण करते हैं-
असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥२। १।१७॥
चेत्=यदि कहो; (दूसरी श्रुतिमे) असद्व्यपदेशात्=उत्पत्तिका पहले इस
जगत्को 'असत्' बतलाया है, इसलिये; न=कार्यका कारणमे पहलेसे ही विद्यमान
होना सिद्ध नहीं होता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; (क्योंकि) धर्मान्त-
रेण=वैसा कहना धर्मान्तरकी अपेक्षासे है; वाक्यशेषात्=यह बात अन्तिम वाक्य-
से सिद्ध होती है।