ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा
इस ग्रन्थ के बारे में
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त आचार्य ब्रह्मगुप्त (जन्म 598 ई.) की खगोल-गणित सम्बन्धी प्रसिद्ध कृति है, जिसे उन्होंने 628 ई. में भिल्लमाल (वर्तमान भीनमाल, राजस्थान) में तीस वर्ष की आयु में पूरा किया। गणित के इतिहास में यह ग्रन्थ इसलिए विशेष है कि इसमें शून्य को एक संख्या मानकर उसके साथ जोड़, घटाव और गुणा के नियम, तथा धन और ऋण संख्याओं के नियम पहली बार व्यवस्थित रूप में मिलते हैं। चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल का सूत्र और वर्ग-प्रकृति समीकरणों की 'भावना' विधि भी इसी में है।
ग्रन्थ के अध्यायों में ग्रहों की मध्यम और स्पष्ट गति, त्रिप्रश्न, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, ग्रहों का उदय-अस्त, चन्द्रमा की शृङ्गोन्नति, ग्रह-युति और नक्षत्र-युति, गणित और कुट्टक, छाया, गोल और यन्त्रों का वर्णन है।
यह स्कैन इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोनॉमिकल एण्ड संस्कृत रिसर्च, नई दिल्ली के 1966 के संस्करण के प्रथम खण्ड का है, जिसमें मूल के साथ वासना, विज्ञान और हिन्दी टीकाएँ हैं। सम्पादक-मण्डल के प्रमुख आचार्य रामस्वरूप शर्मा थे; प्राक्कथन राजस्थान के राज्यपाल डॉ. सम्पूर्णानन्द ने और भूमिका डॉ. सत्यप्रकाश ने लिखी। प्रकाशन भारत सरकार के शिक्षा मन्त्रालय की सहायता से हुआ। इस खण्ड में 737 पृष्ठ हैं।
( १६३ )
वृत्ते शरोने¹गुणितात्⁵ व्यासाच्च²तुराहतात्पदं जीवा ।
ज्यावर्गश्च³तुराहतशरभक्तः शरयुतो व्यासः ॥ ४१ ॥
ज्याव्यासकृतिविशेषा³न्मूलव्यासांतरार्द्धमिषुरल्पः ।
व्योसो¹ ग्रासोनगुणौ ग्रासो नैक्योद्धृतौ² बाणौ ॥ ४२ ॥
इष्टशरस्य¹ भक्ते ज्यार्द्धं कृन्ति²शरफले⁶ युतौ³ व्यासौ⁷ ।
शरयोः प⁸लयोरैक्यं ग्रासौ⁹ ग्रासद्यदुनं⁴ तत् ॥ ४३ ॥⁵
४१. (घ) १. शरोत for (शरोन)
२. व्यासाच्चाँतु (ग) द्वचासा for (व्यासाच्चतु)
३. ज्यावर्गस्य for (ज्यावर्गश्च) ४. तुराहह for (तुराहत)
(ग) ५. गुणिता for (गुणितात्)
(च) ५. गुणिताद्घासाच्च (ङ) for (गुणितात् व्यासाच्च)
४२. (घ) १. व्यासी (ग) (ङ) for (व्यासो)
२. ग्रासोनैक्याघृतौ (ग) ग्रासोतैक्योद्ध ृतौ for (ग्रासोनैक्योद्धतौ)
(ग) ३. विशेषा मूलं for (विशेषान्मूल)
(च) २. ग्रासोनैक्योघृतौ for (ग्रासोनैक्योद्धतौ)
४३. (घ) १. शरद्वयभक्ते (ग) (च) (ङ) for (शरस्यभक्ते)
२. कृतीशर (ग) (ङ) for (कृंतिशर) ३. युते (ग) (च) for (युतौ)
४. ग्रासाद्यदूनं (ग) ह्यदनंतत् for (ग्रासद्यदुनं)
५. + क्षेत्र व्यवहारः समाप्तः+
(ग) ६. पले for (फले) ७. व्यासो for (व्यासौ)
८. पलयो for (फलयो) ९. ग्रासो (ङ) for (ग्रासौ)
(च) २. कृती for (कृंति) ४. ग्रामाद्यदूनं for (ग्रासद्यदुनं)
(ङ) ६. युते for (फले) ३. फले for (युतौ)
४. ग्रासोनमैक्यं for (ग्रासद्यदुनं)
( १६४ )
क्षेत्रव्यव²क्षेत्रफलं वेधगुणं समखातफलहृतं⁵ त्रिभिः³ शून्या⁴ ।
मुखतुल्यतुल्यभुजैक्यानेकाग्रहृतानि⁶ समरस्त्रः⁷ ॥ ४४ ॥
मुखतुलयुतिः¹ दलगुणितं² वेधगुणं व्यासहारिकं³ गणितम् ।
मुखतलगुणैक्यार्द्धं⁴ वेधेन गणितमौच्चम्⁵ ॥ ४५ ॥
उद्रगणिताद्विशोध्य² व्यवहारफलं³त्रिभिर्भजेच्छेषम्¹ ।
लब्धं व्यवहारफले प्रक्षिप्य फलं भवति सूक्ष्मं ॥ ४६ ॥
४४. (घ) १. +अथ खातः+ २. ('क्षेत्र व्यव'—यहाँ लुप्त है) २. (ग) +क्षेत्रव्यवहारः+
३. हृतं (ग) for (हृतं) ४. शून्याः (ग) सूच्याः for (शून्या)
५. मुषतुल (ग) मुखतुल (च) for (मुखतुल्य)
६. न्येका (ग) न्यैकाग्र for (नेकाग्र)
७. समरज्जुः (ग) (ङ) for (समरस्त्रः)
(ग) ८. फलं (च) (ङ) for (फल)
(च) २. क्षेत्रे व्यवहारः समाप्तः, अथ खातः for (क्षेत्रव्यव)
४. शून्याः for (शून्या) ६. न्येकाग्रहृतानि for (नेकाग्रहृतानि)
७. समरत्नः for (समरस्त्रः)
(ङ) २. 'क्षेत्रव्यव' लुप्त ४. सूच्याः for (शून्या)
५. मुखतलतुल्य for (मुखतुल्यतुल्य)
४५. (घ) १. तल (ग) मुखतलयुति (च) for (मुखतुलयुतिः)
२. गणितं (ङ) for (गुणितं)
३. व्यावहारिकं (ग) (च) (ङ) for (व्यासहारिकं)
४. गणितैक्यार्द्धं (ग) मुखवगतैक्यार्द्धं for (गुणैक्यार्द्धं)
५. मौद्रम् (ड्रम्) (ग) मौत्र for (मौच्चम्)
(ग) ६. गुणम् for (गणित)
(च) १. मुखतलयुति for (मुखतुलयुतिः)
४. गणितैक्यार्द्धं (ङ) for (गुणैक्यार्द्धं) ५. मौध्रम् for (मौच्चम्)
(ङ) १. मुखतलयुति for (मुखतुलयुतिः)
६. +स्याद्+ ५ मौत्रम् for (मौच्चम्)
४६. (घ) १. छेषम् (ग) च्छेषम् for (छेषम्)
(ग) २. औंद्र for (उद्र)
(च) २. तुद्र for (उद्र) १. छेषं for (छेषम्)
(ङ) २. औत्र for (उद्र) ३. भजेत् त्रिभिः शेषम् for (त्रिभिर्भजेच्छेषम्)
४. भवति फलं सूक्ष्मम् for (फलंभवतिसूक्ष्मम्)
४. अध्याय १६-२१: शङ्कु-च्छाया, छन्दो-गणित, गोलाध्याय, यन्त्राधिकार एवं उपसंहार
( १६५ )
¹खाते व्यवहारश्चतुर्थः
आकृतिफलमौ²व्याहतमग्रतलैक्यार्द्धमौच्च्य²दैर्घ्य³गुणम्⁴ ।
घनगुणित⁵मिष्टकाघनफलेन हृत⁶मिष्टकागणितम् ॥ ४७ ॥
⁷चितिव्यवहारः समाप्तः ॥
विस्तारायां¹मांगुलघातो मार्गा²हतो द्विवेदहृतः³ ।
किष्कं⁴ गुलं⁵ग्निलब्धं तत्पणवतिर्भवति कर्मैः⁶ ॥ ४८ ॥
४७. (घ) १. ख्याव्यवहार (ग) श्री खातव्यवहारश्चतुर्थः for (खातव्यवहारश्चतुर्थः)
२. मौन्य (ग) मौव्य for (मौच्च्य)
३. दैघ्य for (दैर्घ्य) ४. गुणाः (च) for (गुणम्)
५. गणित (ग) (च) (ङ) for (गुणित) ६. हृत (ग) (च) (ङ) for (हृतं)
(ग) ७. चितव्यवहारः for (चितिव्यवहारः)
(च) १. ख्याव्यवहारश्चतुर्थः for (खातव्यवहारश्चतुर्थः)
(ङ) १. “खात—चतुर्थः” लुप्त ७. मौच्च्याहत for (मौव्याहत)
२. मौच्च्य for (मौच्च्य) ७. इति चितिब्यवहारः for (चितिव्यवहारः समाप्तः)
४८. (घ) १. विस्तराया for (विस्तारायां)
२. मागहितो (ग) मागृहितो for (मार्गाहतो)
३. द्विवेहृतः (ग) द्विवेदहृतः (च) (ङ) for (द्विवेदहृतः)
४. किष्कं (ग) (च) for (किष्कं)
५. गुलानि (ग) (च) (ङ) for (गुलग्नि) ६. कर्म्मः (ग) for (कर्मैः)
(ग) ७. विस्तारायामंगुल for (विस्तारायांमांगुल)
(च) ७. विस्ताराया for (विस्तारायां) ६. कर्मे (ङ) for (कर्मैः)
(ङ) ७. विस्तारायामाङ्गुल for (विस्तारायांमांगुल)
८. षण्णवति for (पणवति)
( १६६ )
शाकादिषु शाल्मल्यां¹ शतद्वयं जीवके⁴ शतं विंशं शालैः⁵ ।
सरलादिषु² सर्वविहङ्गरुसु³ चतुः षष्टिः ६ ॥ ४६ ॥
क्रवच व्यवहार समाप्तः ।
नवमं¹ सूकिषु² दशमस्थूलेष्वेकादशो भवत्यणुषु ।
परिधेर्वेध⁴परिधिः षडंशवर्गो³ हतो गणितम् ॥ ५० ॥
द्विचतुः सत्र्यंशगुणोमित्यंतर¹ बाह्यकोणगः ।
परिधिः² प्राग्वत्कृत्वा गणितं तद् गणितं स्वगुणकारहूतं³ ॥ ५१ ॥
राशिव्यवहारः⁴ समाप्तः ।
४६. (घ) १. शालाल्पांश for (शाल्मल्यांश)
२. सरलादिषुशतं सर्व (ग) for (सरलादिषुसर्व)
३. विदारूपु (ग) विवहारुषु for (विहङ्गरुसु)
(ग) ४. बीजकेन for (जीवके)
५. यहां 'विंशं' पर श्लोकार्थ समाप्त करके 'शाल' से दूसरी पंक्ति आरम्भ है।
(ङ) ६. क्रकचव्यवहारः (च) for (क्रवचव्यवहार)
(च) ५. वीशंशालः for (विशंशालः) २. +शतं+
३. विदारुषु for (विहङ्गरुसु)
(ङ) ५. विंशं for (विशंशालः) २. ३. शतमथाविदारुषु for (सर्वविहङ्गरुषु)
६. लुप्त।
५०. (घ) १. नवमं शूकिषु (ग) नवमः सूकिषु for (नवमसूकिषु)
२. दशमः (ग) (ङ) for (दशम) ३. वर्गाह्तो (ग) वग्राहतो for (वर्गोह्तो)
(ग) ४. परिधेर्वेधः (च) (ङ) for (परिधेर्वेधः)
(च) १. नवमंशूकिषु for (नवमसूकिषु) ३. वर्गाह्तो (ङ) for (वर्गोह्तो)
(ङ) १. नवमः शूकिषु for (नवमसूकिषु) ५. परिधेः for (परिधिः)
५१. (घ) १. भित्त्यंतर (ग) (च) for (मित्यंतर)
२. परिधिः (यह शब्द पहली पंक्ति का अन्तिम शब्द है) (ङ)
३. हृतम् (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
(ङ) १. मित्यन्तर् for (मित्यंतर)
४. इति राशिव्यवहारः for (राशिव्यवहारः समाप्तः)
( १६७ )
छायांतरसैकहृतं द्युदलं प्रागपरयो र्द्युगतशेषम् ।
दिनगतं शेषांशहृतं द्युदलं छायांतरव्येकम् ॥ ५२ ॥
दीपतलशंकुतलयोरंतरमिष्टप्रमाणशंकुगुणम् ।
दीपशिखोच्चा शंकुं विशोध्य शेषोद्धृतं छाया ॥ ५३ ॥
छायाग्रांतरगुणिता छाया छायांतरेण भक्ता भूः ।
भूः शंकुगुणा छाया विभाजिता दीप शिखौच्यम् ॥ ५४ ॥
छाया व्यवहार समाप्तः
गुणकार खण्डतुल्यो गुण्यौ गोमूत्रिकाकृतौ गुणितः ।
सहितः प्रत्युत्पन्नो गुणकारभेदतुल्यो वा ॥ ५५ ॥
५२. (घ) १. +अथछाया+ (आरंभिक प्रकरण का नाम)
२. छायानरसैकहृतं (ग) (ङ) for (छायांतरसैकहृतं)
३. द्युगतशेषम् (ङ) (ग) र्धुगशेषम् for (द्युगतशेषम्)
४. दिनगत (ग) (च) (ङ) for (दिनगतं)
५. हृतं (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
६. छायानरव्येकम् (ग) छायामराव्येकम् for (छायांतरव्येकम्)
(च) १. +अथछाया+ ७. हृतं for (हूतं)
३. र्धुगतशेषं for (द्युगतशेषम्)
(ङ) १. छायानरव्येकम् for (छायांतरव्येकम्)
५३. (घ) १. शंकु (ग) च्यं छं कुं for शंकुं २. दोषोद्धृतं for (शेषोद्धृतं)
(ग) ३. दीपशिखौ (च) for (दीपशिखो)
(च) १. व्याछंकुं for (च्याशंकुं)
(ङ) ३. शिखोच्च्याच्छंकुं for (शिखोच्चाशंकुं)
५४. (घ) १. दीपक (च) for (दीप)
(ग) २. भक्ता (अतिरिक्त अंकित) ३. छायाव्यबहारः for (छायाव्यवहार)
(ङ) १. दीपशिखयौच्यम् for (दीपशिखौच्यम्)
५५ (घ) १. स्वंज for (खण्ड) २. ण्गुण्यो (ग) गरणो for (गुण्यौ)
३. कृतो (ग) (ङ) for (क्रतो)
४. प्रत्युत्पन्नौ (ग) प्रत्युत्पन्नो for (प्रत्युत्पन्नो)
(ग) ५. गणितः for (गुणितः)
(ङ) २. गुण्यो for (गुण्यौ)
( १६८ )
गुण्यो राशिर्गुणाकारराशिनैष्टे¹धिकोनकेन गुणः ।
गुण्यै³ष्टवधो न यतो² गुणके⁴भ्यधिकोनके कार्यः ॥ ५६ ॥
छेदेनैष्ट युतोनेनां² संभाज्यादन⁴ष्टमिष्टगुणम् ।
प्रकृतिस्थच्छेदहूतं³ लब्ध्वा⁵युतहीनकमनष्टम् ॥ ५७ ॥
गुणा¹च्छेदफलवधो गुणकहतो³ गुण्यभाजितो गुणकः ।
छेदो धृतः⁴ फलं गुण्यगुणवधः फलहूतः² छेदः ॥ ५८ ॥
गुण्य¹गुणकारयोः⁶ छेदलब्धयो⁷ द्वयो² द्वयोर्नाशः ।
तेषां दश्यो³ व्यस्तौ⁴ कृत्वा तस्थानयो रिष्टौ⁸ ॥ ५६ ॥
५६. (घ) १. राशिनेष्टा (ग) (च) (ङ) for (राशिनैष्ट)
२. युतो (ग) (च) (ङ) for (यतो)
(ग) ३. गुण्यष्ट for (गुण्यैष्ट) ४. गुणिकेभ्य for (गुणकेभ्य)
(च) ३. गुणोष्ट for (गुण्यैष्ट)
(ङ) ४. गुणकेऽभ्यधिको for (गुणकेभ्यधिको)
५७. (घ) १. छेदो नष्टयुतो for (छेदेनेष्टयुतो)
२. नेनाप्तं (ग) (च) (ङ) for (नेनासं)
३. हृतं (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
(ग) ४. दिनष्ट for (दनष्ट) ५. लब्ध्वायूतकम् for (लब्ध्वायुतं)
(ङ) ५. लब्ध्या for (लब्ध्वा)
५८. (घ) १. गुण्य (ग) (ङ) for (गुण)
२. फलहृतः (ग) फलहृत (च) for (फलहूतः)
(ग) ३. हृतो for (हतो)
(ङ) ३. गुणकहृतो for (गुणकहतो) ४. दृतः for (धृतः)
२. फलहूतश्छेदः for (फलहूतः छेदः)
५६ (घ) १. गुणागुण for (गुण्यगुण)
१. द्वियोर्द्वयोर्नाशः (गं) वा द्वयोर्द्वयोर्नाशः for (द्वयोद्वयोर्नाशः)
(ग) ३. दृश्यो (च) for (दश्यो) ४. व्यस्तो for (व्यस्तौ)
(च) १. विसर्ग लुप्त २. द्वंयोर्द्वयोर्नाशः for (द्वयोद्वयोर्नाशः)
५. तस्यानयौ for (तस्थानयौ)
(ङ) ६. कारयोश्छेद for (कारयोः छेद) ७. लब्धयोर्यदि द्वयो for (लब्धयोद्वयो)
२. द्वयोर्द्वयो for (द्वयो द्वयो) ३. दृश्यौ for (दश्यो)
८. श्चेष्टौ for (रिष्टौ)
( १६६ )
गुण्यं गुणकारं वा गुणये³ छेदेन भागहरस्य¹ ।
गुण्यगुणकारराश्यो⁴ छेदगुणो⁵ भागहरश्च² ॥ ६० ॥
छेदस्य¹ छेदरूपं कृत्वा न्यदूक्तवत्सर्वम् ।
अपवर्त्यो² तुल्यो³ न छेदगुणौ⁴ छेदगुण्यौ⁶ वा ॥ ६१ ॥
स्वविकलषष्ट्यंशगुणं⁴ सकलस्त्र्यंशोद्धतो¹ विकलवर्गः⁵ ।
प्रश्नेप्यः² सकलकृतौ वर्गघातौ³ द्वित्रितुल्यवधौ ॥ ६२ ॥
राशेखनं¹ द्विगुण² बहुतरगुणमूनकृतियुतं³ वर्गः ।
राशेरिष्टयुतोनाद्धः कृतिवेष्टकृतियुक्तः⁵ ॥ ६३ ॥
६०. (घ) १. भागहारस्य (ग) (च) (ङ) for (भागहरस्य)
२. भागहारश्च (ङ) for (भागहरश्च)
(ग) ३. गुणयो for (गुणये)
(च) २. भागहारश्च for (भागहरश्च)
(ङ) ३. गुणयेच्छेदेन for (गुणयेछेदेन) ४. राश्योश्छेद for (राश्योच्छेद)
६१. (घ) १. अच्छेदस्य छेदं (ग) for (छेदस्य छेदरूपं)
२. अपवत्यौ for (अपवर्त्यौ) ३. तुल्येन (ग) for (तुल्योन)
४. छेदगुणौ (ग) for (छदगुणौ)
(ग) ५. दुक्तवत्सर्वम् (ङ) for (दूक्तवत्सर्वम्) ६. छेदगुप्यो वा for (छेदगुण्यौ वा)
(च) ५. न्युदुक्तवत् for (न्यदूक्तवत्) २. अपवर्त्त्यौ for (अपवर्त्यौ)
४. छेदगुणौ for (छदगुणौ)
(ङ) १. अच्छेदस्य for (छेदस्य)
३, ४, ६. छेदगुणौ तुल्येनेष्टेन for (तुल्यो न छदगुणौ छेद)
६२. (घ) १. सकलस्त्रिंशोद्धृतो (ग) सकलस्त्रिशोद्धृतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
२. प्रक्षेप्यः (ग) (च) (ङ) for (प्रश्नेप्यः)
३. वर्गघनौ (ग) वग्रेघनौ for (वर्गघातौ)
(ग) ४. वश्यंशगुणः for (षष्ट्यंशगुणं) ५. वग्रेः for (वर्गः)
(च) १. सकलस्त्रिशो हृतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
(ङ) ६. गुणः for (गुणं) १. सकलास्त्रिंशोद्धतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
३. वर्गघनौ for (वर्गघातौ)
६३. (घ) १. रूनं (ग) (च) (ङ) for (खनं) २. वेंष्ट (ग) (च) for (वेष्ट)
(ग) ३. कृवि for (कृति) ४. बुतं वग्रेः for (युतं वर्गः)
५. र्युक्तः for (युक्तः)
(च) ३. क्रति for (कृति
( १७० )
इष्टालपराशिवर्गौ युक्तोना वितरत्रिकलवर्गाभ्याम् ।
द्विगुणोत्तरराशिभ्याम्¹ भक्तौ³ तेनाधिकाभ्याम्² ॥ ६४ ॥
स्थानांतरेषु लब्धं येन समं² फलयुतोनकच्छेदः³ ।
दलित¹कृतियोगान्तरपदमितरो वा फलयुतो नः ॥ ६५ ॥
दिग्मात्रमेतदन्या⁴ ज्योत्पत्तौ कुट्टके च कथयिष्ये ।
संकलितादिष्टार्याः¹ षट्षष्टिर्द्वादशोऽध्यायः² ॥ ६६ ॥
इति³ ब्रह्मगुप्ते द्वादशोऽध्यायः ।
इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते द्वादशोध्यायः ।
६४. (घ) १. द्विगुणोतर (ङ) for (द्विगुणोत्तर)
२. तेनाधिकोनाभ्याम् (ग) (च) (ङ) for (तेनाधिकाभ्याम्)
(ग) ३. भक्तो for (भक्तौ)
(च) १. द्विगुणोतर for (द्विगुणोत्तर)
६५. (घ) १. दलितः (ग) (च) (ङ) for (दलित)
(ग) २. 'समं' यहां अंकित नहीं है ।
(ङ) ३. युतोनकच्छेदः for (युतोनकच्छेदः)
६६. (घ) १. संकलितादिष्वार्याः (ग) for (संकलितादिष्टार्याः)
२. +६६+
३. यह पंक्ति इस प्रति में लुप्त है । (ग)
(ग) ४. दिग्मात्रामेतदत्य for (दिग्मात्रमेतदन्या)
(च) ३. 'इति' से 'अध्याय' तक समाप्तिसूचक वाक्य लुप्त ।
(ङ) ४. दिङ्मात्रमेतदन्यज् for (दिग्मात्रमेतदन्या)
१. दिष्वार्या for (दिष्टार्याः)
त? Wait, look at the letter after र्यु: गwith something? No,गयात! Wait, what is that smudge above ग? It's a superscript १or a stray mark? Wait, look at line 8: superscript१is right below it: In line 8,१is aboveवायुगगतयो! Wait! The १aboveवायुगगतयोis sitting right above theवा, which is just under र्हृष्टै र्युगयात! Ah! That mark above र्युin line 7 is actually a superscript१for line 8! Wait, no: Look at line 7:अधिमासकैः सविकलैर्हृष्टै- aboveअधिमासकैःis२. Above मवमररात्रैर्वाis३. In line 8: Above वायुगगतयो(aboveवा) is १. Above कालतंत्रज्ञः(aboveतं) is ४. So that mark between line 7 and 8 is १! And what about line 7 itself: अधिमासकैः सविकलैर्हृष्टै र्युगयातमावमररात्रैर्वा ।Wait, does it have a space:सविकलैर्हृष्ट
( १७२ )
त्रिगुणः शनिरिन्दु¹नोन्येभगणलब्धैर्ग्र²हादिभिः सहितः ।
भौमो³ऽर्को गुरुर्दु⁵च्चं वान्य⁴भगणाः के ॥ ६ ॥
द्वित्रिगुणयो रविर्द्वोर्युति¹ कुजोन्यान्यभगणलब्धेन ।
राश्यादिना²धिकगुरुरूना शशि³रन्यभगणाः के ॥ ७ ॥
द्रष्टो¹द्यधिकान³श्विन्यौ दयिका⁴त्वाकरो तिथौ² मध्यात् ।
मध्यार्कं⁵ गुणकं⁶ गुणमिष्टं मध्यं स तंत्रज्ञः ॥ ८ ॥
पातो¹नतुल्योगमतीन् प्रतिलोममतीन् ।
ग्रहान् दिवसं² वारं विपरीतैः शन्याद्यैर्यो वेत्ति³ स कालतंत्रज्ञः ॥ ६ ॥
६. (घ) १. रिन्दुनोऽन्य (ग) रिन्दूनोन्य for (रिन्दुनोन्य)
२. गृंहादिभिः (ग) for (ग्रंहादिभिः)
३. भौमो हीनोर्को (ग) भौमो हीनोर्को for (भौमोऽर्को)
४. वान्यभगणाः for (वान्यभगणाः)
(ग) ५. रिदूच्चं for (रिदुच्चं)
(च) ३. भौमोर्को for (भौमो
( १७३ )
व्यतीपातं³वैधृतबृहस्पतिवर्षस्वोच्चनीचपरिवर्तनात्¹।
द्विग्रहयोगांश्च² युगे यो वेत्ति स कालतंत्रज्ञः⁴॥ १० ॥
सावनमासाब्दाधिप होरेशानिष्ठमध्यसंयोगात् ।
इष्टगुणितेर्युतोनो दिष्टान्यो वेत्ति गणकः सः ॥ ११ ॥
युगरविदिवसैर्गुणितां¹ गताधिमासाः स्वशेषसंयुक्ता² ।
भक्ता युगाधिमासैः फलं युगादेर्गता दिवसाः ॥ १२ ॥
गुणितानि चन्द्रदिवसैर्गतावमानि¹ स्वशेषसहितानि ।
विभजेद्युगावमैः फलमनष्टमधिमासकैर्गुणि²तम् ॥ १३ ॥
हूतं¹मिंदु⁵दिनैर्लब्धा²धिमासदिवसैर्विहीन³कमनष्टम् ।
युगयातदिनान्यधि⁴मासदिनगोष्टग्रहह्याद्यम॑त⁶ ॥ १४ ॥
द्युगुणैंदु¹दिवसघातात्² कुदिनाप्तमधो³युगादिमासगणम्⁴ ।
युगश
( १७४ )
गुणमधिमासकशेषं युगकुदिनै खमशेषमधिमासैः ।
तद्युतिरिन्दु¹दिनहृता²धिमासशेषं³ स्फुटं भवति ॥ १६ ॥
कुदिनगताधिकमासक¹घातः स्पष्टाधिमासशेषयुतः
भक्तो युगाधिमासै²रहाणिः पूर्ववन्मध्याः³ ॥ १७ ॥
भूदिनगता इवमवधः¹ शेषयुक्तो युगावमविभक्तः ।
लब्धं भवति द्युगुणो² युगयातो मध्यमाः³ प्राग्वत् ॥ १८ ॥
युगगंतरा¹शिमासवधाद्रविमासाप्तं दिना²कृतं सदिनम् ।
भूदिनगुण³शशिदिनहूत⁴पाप्त⁵महर्गणः मैकम्⁶ ॥ १६ ॥
१६. (घ) १. दित for (दिन) २. हृताधि (च) for (हृताधिमास)
(ग) ३. शेषस्फुटं for (शेषं स्फुटं)
१७. (ग) १. 'क' अंकित नहीं
२. मासरहर्गणः for (मासैरहाणिः)
३. पूर्ववत् मध्या for (पूर्ववन्मध्या)
(च) २. युगाधिमासैरहर्गणः for (युगाधिमासै रहाणिः)
१८. (ग) १. वधः स्वशेष for (वधः शेष)
२. द्युगणो (ग) (च) for (द्युगुणो)
(ग) ३. मध्यमा for (मध्यमाः)
(च) १. +स्व+
१९. (घ) १. युगगराराशि (ग) युगतराशि for (युगतराशि)
२. दिनीकृतं (ग) (च) for (दिनाकृतं)
३. गुणं for (गुण)
४. शशिदिनैर्हता (ग) शशिदिनहृत for (शशिदिनहूत)
५. माससंहर्गणः (ग) प्राप्तमहर्गणः for (पाप्तमहर्गणः)
६. सैकम् (ग) (च) for (मैकम्)
(ग) ७. मासास्त for (मासाप्तं)
(च) ५. माससंहर्गणाः for (पाप्तमहर्गणः)
४. दिनहृत for (दिनहूत)
( १७५ )
गतदिवसा पृथक् विभासक गुणिता रविदिनाप्तमासदिनैः सहिता ।
पृथगवमगुणा शशिदिवसाप्तोनकाकपशः ॥ २० ॥
गुणिताद्युगाधिमासैर्य्युगभूदिवसैर्हतादवमशेषात् ।
फलयुक्तमधिकमासकशेषं मध्यावतोऽर्केन्दू ॥ २१ ॥
अधिमासोवमशेषंयुगशशिभूहृते पृथग्लब्धे
मासदिनाद्ये स्थाप्ये गतमासदिनानि चैत्राद्यैः ॥ २२ ॥
अवमावशेषलब्धा सहितानि पृथक् त्रयोदशगुणानि ।
अधिमास शेषलब्धा हीनानि पृथग् रविशशांकौ ॥ २३ ॥
२०. (घ) १. पृथगविमासकगुणिता (ग) पृथगधिमासकगुणिता for (पृथक् विभासक-
गुणिता)
२. सहिताः (ग) for (सहिता)
वि० यह दूसरी पंक्ति का आरंभिक शब्द है
३. पृथगवमगुणाः (ग) for (पृथग्वमगुणा)
४. द्युपणः for (कपशः)
(ग) ५. गतदिवसाः for (गतदिवसा)
६. दिवसाप्तोन······॥ २० ॥ for (दिवसाप्तोन)
(च) १. पृथगविमासक for (पृथक् विभासक)
७. मासदिनैःसहिताः for (मासदिनैः सहिता)
३. पृथग् वमगुणाः for (पृथग्वमगुणा) ४. काद्युषशः for (काकपशः)
२१. (घ) १. ऽर्केन्दुः for (ऽर्केन्दू)
(ग) २. (भू) अंकित नहीं २. हॄता for (र्हॄता)
४. फलयुक्तं मधिमासशेषं for (फलयुक्तमधिकमासकशेषं)
(च) ३. हृता for (र्हॄता) १. मध्यावतोऽर्केंदू for (मध्यावतोऽर्केन्दू)
२२. (घ) १. शेषे (ग) for (शेष)
२. भूदिनहृते (ग) भूदिनहृता for (भूहृते)
(ग) ३. मधिमासावम for (अधिमासोवम)
४. चैत्रादै for (चैत्राद्यैः)
(च) २. +दि+
२३. (घ) १. हीनातिपृथग् for (हीनानि पृथग्)
(ग) २. लब्धाः for (लब्धा) ३. सहिता for (सहितानि)
४. तयोदंश for (त्रयोदश) ५. गुणाणेनि for (गुणानि)
६. शशिकौ for (शशांकौ)
( १७६ )
गतमासदिनावशेष²लब्धियोगाः³ त्रयोदशगुणाश्च⁴ ।
अधिमासशेषलब्धारविचन्द्रोच्चे¹ युते शोध्ये ॥ २४ ॥
केन्द्रे³ पृथक्⁴ फले द्वादशोद्धृते न्यस्तमृणधनं⁵ सौरम् ।
अनुलोममैदवं¹ मासदिनावशेषलब्धियुतौ² ॥ २५ ॥
तिथिविकलषष्टि¹घाताद्रविहृत²भुक्त्यंतराप्त³घटिकासु⁴ ।
देशांतरमनुलोमं⁵ भुजांतरं⁶ चार्कं⁷ फलमसवः ॥ २६ ॥
अवमविकलं न सावनमेभिः परिकल्पितं यतश्चांद्रम्² ।
नार्थभटाद्यैः³ प्रश्नो मध्यान्त्वत्वा कृतो ज्ञातः¹ ॥ २७ ॥
ज्ञातभुगणादिभुक्तं¹ सविकलम्राष्ट युगभगणसंगुणितम्³ ।
ज्ञातयुगभगणभक्तं² मध्योभगणादिफलमिष्टः ॥ २८ ॥
२४. (घ) १. चन्द्रोच्चे for (चन्द्रोच्चै)
(ग) २. दिनावमशेष for (दिनावशेष)
३. योगा for (योगाः) ४. त्र्योदश for (त्र्योदश)
(च) ४. त्र्योदश for (त्र्योदश)
२५. (घ) १. मैंदवं (ग) मैवं for (मैदवं)
२. लब्धयुतो for (लब्धियुतौ)
(ग) ३. केन्द्रं for (केन्द्रे) ४. पृथक् for (पृथक्)
५. बस्तमृण for (न्यस्तमृण)
२६. (ग) १. 'ष्टि' for (षष्टि)
२. द्रविहित for (द्रविहृत) ३. भुक्तांतराप्त for (भुक्त्यंतराप्त)
४. घटीकासु for (घटिकासु) ५. मनुलोमी for (मनुलोमं)
६. भुजांतर for (भुजांतरं) ७. वार्क for (चार्कं)
(च) २. द्रविह्वत for (द्रविहृत)
७. चार्कु for (चार्कं)
२७. (घ) १. कृतोज्ञातः for (कृतोज्ञातः)
(ग) २. यतश्चान्द्र for (यतश्चान्द्रम्) ३. प्रस्नो for (प्रश्नो)
२८. (घ) १. भगणादि (ग) (च) for (भुगणादि) २. मिष्टम् for (मिष्ट)
(वि०)—इस श्लोक की दोनों पंक्तियों के मध्य में निम्नांकित तीसरी
पंक्ति भी दी गई है—
"ज्ञात युगभगणादिभुक्तं सविकलम्राष्ट युग भगण संगुणितम्"
(ग) ३. संयुणितम् for (संगुणितम्)
( १७७ )
इष्टाहतभक्तानां ध्व्यादिनां संयुतेर्द्वयोरथवा ।
इष्टगुणाकारगुणयोर्विभक्तयोर्वांतरादथवा ॥ २६ ॥
ज्ञानेकभगणभुक्तिस्तद्भगमाप्तं यदिष्टभगणेभ्यः ।
भगणदिवसविकलं सविकलेष्टभगणादि गुणमिष्ट ॥ ३० ॥
शशिदिनगुणं सविकलं वड्डू ु क्तं मंडलादितद्गणैः ।
विभेजफलं सविकलास्थितयः प्राग्वत् स्फुटीकरणम् ॥ ३१ ॥
पातेंदुयोगलब्धौ कृत्वा देशांतराद्यमनुलोमम् ।
विक्षेपो स्यात्सूर्यादिभिर्विनेन्दुग्रहणेमेवम् ॥ ३२ ॥
कुदिनहुतमवशेषं द्वादशभिर्गुशितं मासमशद्यम् ।
द्वादशगुणतिथ्यंशैर्युतं धनं भास्करे चंद्रः ॥ ३३ ॥
२६. (घ) १. नांयादीनां (ग) नां द्वयादीनां for (ध्व्यादिनां)
(ग) २. वांतरदथवा for (वांतरादथवा)
(च) १. द्वयादीनां for (ध्व्यादिनां)
३०. (घ) १. ज्ञातैक (च) for (ज्ञानेक)
२. भाप्तं (च) for (माप्त)
३. भगणादिसविकलं for (भगणदिवसविकलं)
(ग) ४. भगणस्तद्गणगात for (भगणभुक्ति) ५. यं for (य)
६. भगणादि दिसविकलं for (भगणदिवसविकलं)
७. गुणमिष्टम् for (गुणमिष्ट)
(च) ६. भगणा for (भगण)
३१. (घ) १. विभजेत्फलं (च) for (विभेजफलं)
(ग) २. यडू ु क्तं for (वड्डू ु क्तं)
३. स्तितयः (च) for (स्थितयः)
३२. (घ) १. विक्षेपोस्मात् (ग) (च) for (विक्षेपोस्यात्)
(च) २. ऋत्वा for (कृत्वा)
३३. (घ) १. हृत for (हुत) २. माप्त (ग) (च) for (मास)
(ग) ३. मवमशेषं for (मवशेषं) ४. गुंणित for (गुशितं)
५. मंशाह्यम् for (मशद्यम्) (च)
(च) १. हूत for (हुत)
( १७८ )
द्युगुणं¹ युगाधिमासैर्गुणितं युगभूर्दिनै⁵र्भजेल्लब्धम्² ।
भगणादिमध्यमार्कस्त्रयोदश गुणाधिकश्चन्द्रः⁴ ॥ ३४ ॥
इष्टगुणकारगुणितं ग्रहभगणैक्वांतरं³ यथा निहितम्⁴ ।
कृत्वा⁶ कुदिनैर्विभजे छेप्रो न युतानि कुदिनानि ॥ ३५ ॥
ऋधनभगणलब्धं¹ धनर्णामिष्टग्रहस्य² युगभगणैः ।
अन्यफलमृणाधनं चेदूनयुतान्यन्ययुगभगणाः ॥ ३६ ॥
भदिनानि ग्रहभगणैरूनानि भवंति सावनदिनानि ।
इष्टाश्विन्योदयिकाः¹ स्वसावनैः पूर्ववन्मध्याः ॥ ३७ ॥
रविभगणाप्तं¹ दिसविकलं ज्ञेयमंडलेभ्यो यत् ।
मध्यार्कसविकलकलासंगुणितं³ ज्ञेयमध्यमकलाः² ॥ ३८ ॥
३४. (घ) १. द्युगणं (ग) द्युगुणं for (द्युगुणं) २. भीजल्लब्धम् for (भजेल्लब्धम्)
३. मध्यमार्कत्रयोदश (ग) for (मध्यमार्कस्त्रयोदश)
४. गुणाधि चंदुः (ग) गुणाधिकं चन्द्रः for (गुणाधिकश्चन्द्रः)
(ग) ५. भूर्दिनै (च) for (भूर्दिनै)
(च) १. द्युगणं for (द्युगुणं) ३. मध्यमार्कत्रयोदश for (मध्यमार्कस्त्रयोदश)
४. गुणाधिकश्चेंदुः for (गुणाधिकश्चन्द्रः)
३५. (घ) १. गुणित for (गुणितं)
२. क्षेषोऽनयुतानि for (क्षेपो न युतानि)
(ग) ३. क्यांतरं for (क्वांतर)
४. भिहितम् for (निहितम्)
५. विभजेत् शेषो for (विभजे क्षेपो)
(च) ६. क्रत्वा for (कृत्वा)
३६. (घ) १. यद्यन्य (ग) for (ऋधन) २. धनर्ग (ग) for (धनर्गा)
(च) १. अद्य for (ऋद्य) २. धनर्ण्य for (धनर्गा)
३७. (घ) १. इष्टाश्विन्योदयिकाः (ग) for (इष्टाश्विन्योदयिकाः)
(ग) २. सवनदिनानि for (सावनदिनानि)
३८. (घ) १. रविभगणाप्तलिप्तादि for (रविभगणाप्तम्)
(ग) २. मध्यकलाः for (मध्यमकलाः)
(च) ३. मध्यार्क for (मध्यार्क)
( १७६ )
इष्टभगोने¹ भूदिनशेषैर्भगणैः क्रतो² मध्यः ।
अनुलोगमगो विलोमो भवति विलोमोऽनुलोमगतिः³ ॥ ३६ ॥
द्युगुणेन² कुदिनशेषैरनुलोमगो³ विलोमगतिः ।
भवति विलोमो मध्योरनुलोमगो² वाकृतः प्राग्वत्⁴ ॥ ४० ॥
कल्पदिनसप्तकवधात् कल्पगताहर्गणोनकच्छेषात्² ।
सप्तहृता¹ दिनवारः शेषं³ शन्यादिको भवति ॥ ४१ ॥
व्यतीपातं³ वैधृत्यान्यर्कं⁴ चंद्रभगणयुताद्विसंगुणिता¹ ।
गुरूवर्षाण्याश्चा युजा द्वादशगुणिताः² गुरोर्भगणाः ॥ ४२ ॥
स्वोच्चग्रहयुगभगणा विशेषिता²स्वोच्चनीचपरिवर्ताः ।
भगणांतरं वियोगा¹ कार्यास्त्रैराशिकेन गताः ॥ ४३ ॥
३६. (घ) १. इष्टभगणोन (ग) (च) for (इष्टभगोन)
२. कृतोग्रहो मध्यः for (क्रतोमध्यः)
३. लोमोऽनुलोमगतिः (ग) तिलोमोऽनुलोमगतिः for (विलोमोऽनुलोमगतिः)
(च) २. क्रतो ग्रहोमध्या for (क्रतोमध्यः)
४०. (घ) १. द्युगणेन (ग) (च) for (द्युगुणेन)
२. मध्योऽनुलोमगो (ग) मध्योनुलोमगो for (मध्योरनुलोमगो)
(ग) ३. शेषैर्भगणै for (शेषैरनुलोमगो) ४. प्रग्वत् for (प्राग्वत्)
(च) २. मध्योऽनुलोमगो for (मध्योरनुलोमगो)
४१. (घ) १. सप्तहृताहिनवारः (ग) सप्तहृतादिनवारः for (सप्तहृतादिनवारः)
(ग) २. हर्गणो for (हर्गणो) ३. शेषः for (शेषं)
(च) १. सप्तहृताहिनवारः for (सप्तहृतादिनवारः)
४१. (घ) १. संगुणिताः (ग) (च) for (संगुणिता)
२. गुणिता गुरोर्भगणाः (ग) for (गुणिताः)
(ग) ३. व्यतीपात for (व्यतीपात) ४. भगणा for (भगण)
(च) ५. वैधृत्यान्यर्कं for (वैधृत्यान्यर्क) २. गुणिता for (गुणिताः)
४३. (घ) १. द्वियोगाः (ग) (च) द्वियोगा for (वियोगा)
(ग) २. विशेषिताः for (विशेषिता)
( १८० )
द्युगुणाँ¹स्त्रिंशद् भक्ताद्यल्लब्धं² द्विगुणितं सरूपं⁴ तत् ।
सप्तविभक्तं शेषः सावनमासाधिपोऽर्का³दि ॥ ४४ ॥
षष्टिशतत्रयभक्तात् कल्पगताहर्गणा²त्फलं त्रिगुणम् ।
सैकं³ सप्तविभक्तं सायनवर्षाधिपोऽर्का¹दि ॥ ४५ ॥
अर्कॊ⁵नैलग्नहोरा² पंच गुणाः सविकलाः³ यदि सरूपाः ।
सप्तविभक्तो¹ शेषो दिनाधिपात्⁴ कालहोरेशः ॥ ४६ ॥
त्रिचतुरनंतर षष्ट्यः¹ सावनमासाब्ददिनंस²होरेशाः ।
दिनगतघटिका द्विगुणा³ पंच हृता⁴श्चान्यमतमेतत् ॥ ४७ ॥
गच्छधनमिष्ट गुणितै¹र्धनैर्युतोनं पृथक् पृथक् सहितम् ।
गुणक युतोन पदहृते² सर्वधनमतोवशेषा³णि ॥ ४८ ॥
४४. (घ) १. द्युगणास्त्रिंशद् (ग) (च) for (द्युगुणास्त्रिंशद्)
२. यल्लब्धं (ग) भक्तात् यल्लब्धं for (भक्ताद्यल्लब्धं)
३. ऽर्कादिः for (र्कादि)
(ग) ४. सरूप for (सरूपं)
(च) २. भक्ताद्यल्लन्धं for (भक्ताद्यल्लब्धं) ३. ऽर्कादिः for (र्कादि)
४५ (घ) १. र्कादिः for (र्कादि)
(ग) २. हर्गणा for (हर्गणा) ३. सैक for (सैकं)
(च) १. ऽर्कादिः for (र्कादि)
४६. (घ) १. सप्तविभक्ताः (ग) (च) for (सप्तविभक्ता)
(ग) २. होराः (च) for (होरा) ३. सविकला for (सविकलाः)
४. दिनपाद्यः काल for (दिनाधिपात् काल)
(च) ५. अर्कोन for (अर्कौन)
४७ (घ) १. षष्टाः (ग) (च) for (षष्ट्यः) २. दिवस(ग) for (दिनस)
३. द्विगुणाः (ग) (च) for (द्विगुणा)
(च) २. मासाब्ददिवसहोरे रेशाः for (मासाब्ददिनसंहोरेशाः)
४८ (ग) १. गुणतै for (गुणितै) २. हृतं for (हृत)
(च) ३. शाषेणि for (शेषाणि)
( १८१ )
मध्योत्तरमेकोनार्याः पंचाशस्त्रयोदशोध्यायः ।
ज्ञात्वैनं तंत्रविदामाचार्यो भवति मध्यगतौ ॥ ४६ ॥
इत्तित्रयोदशोऽध्यायः
इति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते मध्यगतिप्रश्नोत्तराध्यायः
त्रयोदशः ।
४६ (घ) १. पंचाशत्त्रयोदशोध्यायः (ग) पंचशत्त्रयोदशोध्यायः for (पंचाशस्त्रयोदशोध्यः)
(ग) २. नार्या for (नार्याः)
३. 'इति' से 'अध्यायः' तक अंकित नहीं, केवल समाप्तिसूचक ॥ छः ॥ ॥छः ॥
॥ छः ॥ अंकित है ।
(च) १. पंचाशत्त्रयोदशोध्यायः for (पंचाशस्त्रयोदशोध्यायः)
३. 'इति' से 'अध्यायः' तक लुप्त.
( १८२ )
अथ स्फुटगत्युत्तराध्यायः
चतुर्दशः
भुजभागैः कोटिज्यां कोट्यंशैः¹ करोति बाहुज्याम् ।
कोटिं³ भुजेन बाहुँ⁴ क्य्योस्त्रावा² स्फुटगतिज्ञः⁵ सः ॥ १ ॥
परमफलकेंद्रविकः¹ करोति कोटिछ्या² स्फुटं कर्णम्⁴ ।
कर्णात्कोटिकोट्या³ बाहुं वा स्फुटगतिज्ञः⁵ सः ॥ २ ॥
केंद्रभुजकोटिजीवा परमफलज्ञः करोति यः कर्णम्¹ ।
स्वोच्चं स्वफल²स्पष्टं करोति यः स्फुटगतिज्ञः सः ॥ ३ ॥
द्युगुण¹स्फुट³ग्रहयो² भुजकोटिज्ये फले विना ज्याभिः ।
ज्याभिर्विना फलधनुः करोति वा स्फुटगतिज्ञः⁴ ॥ ४ ॥
इष्टदिनव्योद्ययिकान्¹ करोति यो मध्यमान् ग्रहान्² स्पष्टान् ।
स्वोच्चस्फुटं³ग्रहं यः करोति वा स्फुटगतिज्ञः सः ॥ ५ ॥
१. (घ) १. कोटचंशौ (ग) (च) for (कोट्यंशै) २. कोट्यावा (ग) (च) for (क्य्योस्त्रावा)
(ग) ३. कोटिभुजेन for (कोटिं भुजेन) ४. बाहु for (बाहुं)
(ङ) २. कोट्या वा for (क्य्योस्त्रा वा) ५. स्फुटगतिज्ञः for (स्फुगतिज्ञः)
२. (घ) १. विद्युः (ग) वित् यः for (केन्द्रविकः) २. ज्यया (ग) (ङ) for (छ्या)
(ग) ३. कोटिम् for (कोटि)
(च) १. विद्युः for (विकः) ४. कर्ण्यं for (कर्णम्)
३. कर्ण्यात्कोटिकोट्या for (कर्णात्कोटिकोट्या) ५. ज्ञतिज्ञः for (गतिज्ञः)
(ङ) १. विद्यः for (विकः) ३. कोटिकोट्या for (कोटिकोट्या)
३. (च) १. कण्येँ for (कर्णँ)
(ङ) २. सफलं for (स्वफलं)
४. (घ) १. द्युगणा (ग) द्युगुणात् for (द्युगुण) २. ग्रहं (ग) (च) (ङ) for (ग्रह)
(ग) ३. स्फुटं (ङ) for (स्फुट) ४. +सः+ (च) (ङ)
(च) १. द्युगणा for (द्युगुण)
(ङ) १. द्युगुणात् for (द्युगुण)
५. (घ) १. इष्टादिनव्यौदयिकान् (ग) इष्टादिनव्योदायिकान् for (इष्टदिनव्योद्ययिकान्)
२. मध्यमान् स्पष्टान् for (मध्यमान् ग्रहान् स्पष्टान्)
(घ) ३. स्पुगतिज्ञः for (स्फुटगतिज्ञः)
(च) १. इष्टादिनव्यो for (इष्टदिनव्यो)
(ङ) ४. मध्यान् for (मध्यमान्)